भारत और अमेरिका के बीच हुई नई व्यापारिक संधि ने देश की राजनीति और अर्थनीति में तेज़ बहस छेड़ दी है। सरकार इसे वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती ताकत और कूटनीतिक सफलता बता रही है, जबकि विपक्ष इसे राष्ट्रीय आर्थिक हितों के साथ समझौता करार दे रहा है।
सरकार का दावा है कि भारतीय उत्पादों पर अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत पर लाना एक बड़ी उपलब्धि है, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और विकास के नए अवसर खुलेंगे। सत्ता पक्ष इसे भारत की “वैश्विक धमक” के रूप में पेश कर रहा है।
वहीं विपक्ष का आरोप है कि सरकार अमेरिकी दबाव में आ गई है। उनके अनुसार, जिन उत्पादों पर पहले 3–4 प्रतिशत टैरिफ लगता था, वह अब बढ़कर 18 प्रतिशत हो गया है। विपक्ष इसे फायदे का नहीं, बल्कि घाटे का सौदा मानते हुए ‘सरेंडर मोड’ की संज्ञा दे रहा है।
यूरोपीय संघ के साथ हुई तथाकथित ‘मदर ऑफ ऑल डील’ से तुलना के बीच यह समझौता और अधिक विवादों में आ गया है।
सवाल सीधा है-
क्या 18 प्रतिशत टैरिफ वास्तव में भारत के लिए लाभकारी है या यह आंकड़ों का खेल मात्र है?
इन्हीं सवालों पर हरिभूमि और INH के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के साथ इस विशेष “चर्चा” में राजनीति और अर्थशास्त्र से जुड़े दिग्गजों ने खुलकर अपनी राय रखी।
इस खास पेशकश में शामिल हुए-
- सुरेंद्र राजपूत- प्रवक्ता, कांग्रेस
- डॉ. सारथी आचार्य- अर्थशास्त्री
- चौधरी राकेश टिकैत- राष्ट्रीय प्रवक्ता, भाकियू
- शरद त्रिवेदी- प्रवक्ता, भाजपा











