सरकार पहले एक पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करेगी, जो ओबीसी आरक्षण को लेकर 'ट्रिपल टेस्ट' सर्वे करेगा। इस सर्वे की रिपोर्ट आने के बाद ही सीटों का नया आरक्षण तय होगा।

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी पंचायत चुनावों को लेकर चल रही अनिश्चितता अब खत्म होती दिख रही है। राज्य सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर स्पष्ट कर दिया है कि प्रदेश में पंचायत चुनाव फिलहाल टलना लगभग तय है।

सरकार का कहना है कि चुनावों से पहले अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण को लेकर एक नया पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया जाएगा।

यह आयोग प्रदेश भर में ओबीसी आबादी का सर्वे करेगा और उसकी रिपोर्ट के आधार पर ही सीटों के आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा। इस प्रक्रिया में समय लगने के कारण अब चुनावों के आयोजन में देरी होना निश्चित है।

​हाई कोर्ट में सरकार का रुख और आरक्षण की पेचीदगी

​सरकार ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' फॉर्मूले का पालन करना अनिवार्य है। इसके तहत बिना ओबीसी आबादी के सही आंकड़ों और पिछड़ेपन की जांच के आरक्षण तय नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार ने कोर्ट को भरोसा दिलाया है कि वह जल्द ही आयोग का गठन कर सर्वे की प्रक्रिया शुरू करेगी। जब तक आयोग अपनी फाइनल रिपोर्ट नहीं सौंप देता, तब तक आरक्षण की नई सूची जारी नहीं की जा सकती, और बिना आरक्षण सूची के चुनावी प्रक्रिया शुरू करना संभव नहीं है।

​सर्वे रिपोर्ट और आयोग के गठन की प्रक्रिया

​पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन के बाद विशेषज्ञों की टीम ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर पर जाकर पिछड़ी जातियों की संख्यात्मक स्थिति का आकलन करेगी। यह सर्वे यह सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है कि आरक्षण का लाभ वास्तविक पात्रों तक पहुँचे और किसी भी संवैधानिक नियम का उल्लंघन न हो।

सरकार का तर्क है कि वह चुनाव में किसी भी कानूनी अड़चन से बचने के लिए यह कदम उठा रही है। इस विस्तृत सर्वे में कम से कम 3 से 6 महीने का समय लग सकता है, जिससे चुनावी कार्यक्रम का आगे खिसकना तय है।

​उम्मीदवारों की बढ़ी बेचैनी और राजनीतिक हलचल

​पंचायत चुनाव टलने की खबर से उन संभावित उम्मीदवारों को बड़ा झटका लगा है जो पिछले कई महीनों से क्षेत्रों में प्रचार और जनसंपर्क में जुटे हुए थे। ग्रामीण इलाकों में इस समय चुनावी माहौल चरम पर था, लेकिन अब नई आरक्षण सूची आने तक समीकरण बदल सकते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस देरी से विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का मौका मिल गया है, जबकि सरकार इसे सामाजिक न्याय और संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा बता रही है।