आईएसआई अब यूपी के युवाओं को 'हैंडलर' बनाने का प्रलोभन देकर आतंकी नेटवर्क का विस्तार कर रही है, जिसमें कम शिक्षित युवाओं को रसूख और पैसों के जरिए बरगलाया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में सुरक्षा एजेंसियां उस वक्त अलर्ट मोड पर आ गईं जब आईएसआई (ISI) के एक नए और खतरनाक रिक्रूटमेंट मॉडल का खुलासा हुआ। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी अब केवल जासूसी ही नहीं करा रही, बल्कि कम पढ़े-लिखे और बेरोजगार युवाओं को 'हैंडलर' बनाने का लालच देकर उन्हें देश विरोधी गतिविधियों के दलदल में धकेल रही है।

इसी के साथ पकड़े गए आईएस (IS) आतंकी हारिश के डिजिटल उपकरणों की जांच में आतंकी हमलों के लिए फंड जुटाने वाले एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का भी पर्दाफाश हुआ है, जो भविष्य में किसी बड़ी अप्रिय घटना की तैयारी में था।

​ISI का नया जाल और 'हैंडलर' पद का खतरनाक लालच 
सुरक्षा एजेंसियों की हालिया जांच में यह तथ्य सामने आया है कि आईएसआई अब भारत में कम पढ़े-लिखे युवाओं को अपना 'सॉफ्ट टारगेट' बना रही है। इस नए 'हैंडलर प्लान' के तहत युवाओं को शुरुआत में छोटे और कम जोखिम वाले काम दिए जाते हैं, जैसे किसी विशेष क्षेत्र की रेकी करना या संवेदनशील ठिकानों की तस्वीरें भेजना।

इन युवाओं का ब्रेनवॉश करने के लिए उन्हें यह भरोसा दिलाया जाता है कि यदि वे इन कार्यों को सफलतापूर्वक अंजाम देते हैं, तो उन्हें संगठन में प्रमोट करके 'हैंडलर' बना दिया जाएगा।

हैंडलर बनने का मतलब है कि वह युवक अपने नीचे अन्य लोगों का गिरोह बना सकेगा और उसे न केवल भारी रकम मिलेगी, बल्कि आतंकी नेटवर्क में एक बड़ा रसूख और पावर भी दी जाएगी।

​आईएस आतंकी हारिश के डिजिटल डिवाइसों से खुले खौफनाक राज 
गिरफ्तार किए गए आईएसआईएल (ISIL) के संदिग्ध आतंकी हारिश के कब्जे से बरामद लैपटॉप और मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच में दहला देने वाले राज उजागर हुए हैं। हारिश केवल कट्टरपंथी विचारधारा का प्रचार ही नहीं कर रहा था, बल्कि वह भारत में आतंकी हमलों को अंजाम देने के लिए एक सुव्यवस्थित तरीके से फंड जुटाने के काम में लगा था।

उसके उपकरणों से कुछ अति-संवेदनशील ठिकानों के डिजिटल नक्शे और हमलों के 'ब्लूप्रिंट' बरामद हुए हैं। जांच में यह भी पता चला है कि हारिश विदेशों में बैठे अपने आकाओं के सीधे संपर्क में था और आतंकी गतिविधियों को वित्तीय मदद पहुँचाने के लिए वह क्रिप्टो करेंसी जैसे जटिल माध्यमों का उपयोग कर रहा था।

​युवाओं को 'सॉफ्ट टारगेट' बनाने के पीछे का कूटनीतिक तर्क 
​आतंकी संगठन और आईएसआई जानबूझकर समाज के उस वर्ग को चुन रहे हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर या कम शिक्षित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे युवाओं को वैचारिक रूप से बरगलाना और उनमें कट्टरपंथ का जहर घोलना अपेक्षाकृत आसान होता है।

इन युवाओं को मामूली काम की आड़ में देश के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों और बुनियादी ढांचे की जानकारी निकालने के काम में झोंका जा रहा है। हाल के दिनों में गाजियाबाद और फरीदाबाद जैसे इलाकों से हुई गिरफ्तारियां इसी रणनीति की पुष्टि करती हैं, जहां साधारण काम करने वाले लोग पर्दे के पीछे से विदेशी हैंडलर्स के लिए जासूसी कर रहे थे।

​सुरक्षा एजेंसियों की डिजिटल घेराबंदी और भविष्य की चुनौती 
​हारिश के पास से मिले डेटा के आधार पर उत्तर प्रदेश एटीएस (ATS) अब उन सभी संदिग्धों की तलाश कर रही है जो इस फंडिंग नेटवर्क का हिस्सा थे। पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां अब टेलीग्राम और अन्य एन्क्रिप्टेड सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चलने वाले उन ग्रुप्स पर पैनी नजर रख रही हैं जहाँ युवाओं को नौकरी या रुतबे का झांसा दिया जा रहा है।

अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यह एक प्रकार का 'हाइब्रिड वॉरफेयर' है, जहा बिना सीमा पार किए स्थानीय लोगों के जरिए ही आंतरिक सुरक्षा को चोट पहुचाने की कोशिश की जा रही है। प्रशासन ने आम जनता से भी अपील की है कि वे सोशल मीडिया पर मिलने वाले ऐसे संदिग्ध प्रस्तावों से सावधान रहें।