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Betul Lok Sabha election 2024: बैतूल लोकसभा क्षेत्र में 7 मई को वोटिंग है। मुख्य मुकाबला यहां भाजपा-कांग्रेस के बीच होता रहा है। इस बार भी भाजपा सांसद दुर्गादास उइके और कांग्रेस के रामू टेकाम ही आमने सामने हैं।  

Betul Lok Sabha election 2024: मध्य प्रदेश की आदिवासी बहुल्य बैतूल लोकसभा क्षेत्र में लड़ाई इस दिलचस्प हो गई। यहां दूसरे चरण में 26 अप्रैल को मतदान होना था, लेकिन बसपा प्रत्याशी अशोक भलावी के निधन के चलते दोबारा नामांकन हुए। मतदान भी तीसरे चरण के लिए टाल दिया गया। अब यहां 7 मई को वोटिंग होगी। 

मोदी इफेक्ट और राम मंदिर का मुद्दा असरदार 
बैतूल में कांग्रेस ने जनजातीय विभाग के स्टेट प्रेसीडेंट राम टेकाम को उम्मीदवार बनाया है। जबकि, भाजपा ने सिटिंग सांसद दुर्गादास उइके को दोबारा मौका दिया है। चुनाव प्रचार के मामले में कांग्रेस यहां भाजपा से काफी पीछे दिख रही है। कांग्रेस प्रत्याशी रामू टेकाम की लोकप्रियता कम नही है, लेकिन मोदी इफेक्ट और अयोध्या राम मंदिर के मुद्दे ने दुर्गादास उइके को प्रभावी बना दिया है। 

1996 से मिल रही भाजपा को जीत 
बैतूल लोकसभा भाजपा के लिए मुफीद सीट बन चुकी है। यह क्षेत्र 1996 से भाजपा के कब्जे में है। कांग्रेस आखिरी बार 1991 में चुनाव जीती थी। तब कांग्रेस के असलम शेर खान ने भाजपा के आरिफ बेग को 23 हजार वोटों के अंतर से चुनाव हराया था। 1991 के बाद से बैतूल में कांग्रेस लगातार चेहरे बदलते रही, लेकिन जीत हासिल नहीं कर पाई। 

बैतूल सीट का जातिगत समीकरण 
बैतूल लोकसभा क्षेत्र में आदिवासी समुदाय के बाद सर्वाधिक मतदाता ब्राह्मण समाज के हैं। इसके बाद गूर्जर और राजपूत मतदाताओं की संख्या है। जाट मतदाता भी यहां पर्याप्त मात्रा में हैं। आदिवासी समुदाय भाजपा कांग्रेस के बीच बंटा नजर आ रहा है। ऐसे में गुर्जर और राजपूत भी दोनों दलों के साथ रहते हैं, लेकिन ब्राह्मण और जाट मतदताओं का झुकाव भाजपा की तरफ
रहता है। दलित समुदाय भी दोनों दलों में बंट जाता है।

गुर्जर समाज का मूड़ बदला, राजपूत यथावत 
विधानसभा चुनाव में हरदा जिले में गुर्जर और राजपूत मतदाता कांग्रेस के पक्ष में गए थे, लेकिन लोकसमा चुनाव में गुर्जर मतदाताओं का मूड़ बदला हुआ दिख रहा है। वह भाजपा के करीब ज्यादा दिख रहे हैं। हालांकि राजपों की नाराजगी अब भी बरकरार है। उनका झुकाव कांग्रेस की ओर है। 

 जीत के जनता से दूर हो गए दुर्गादास 
बैतूल में कांग्रेस और भाजपा के सिम्बल पर चुनाव लड़ रहे रामू टेकाम और दुर्गादास उड़के कई मायनों में समान हैं। दोनों सहज और सरल स्वभाव के व्यक्ति हैं। दोनों वाकपटु भी हैं। दुर्गादास की संस्कृत भाषा में अच्छी पकड़ है। इसका प्रयोग वह अपने भाषण भी करते हैं। कांग्रेस के रामू भी अपने प्रभावी भाषण से लोगों को आकर्षित कर लेते हैं। बैतूल लोकसभा क्षेत्र से दोनों लगातार दूसरी बार आमने सामने हैं। 2019 के चुनाव में दुर्गादास ने साढ़े 3 लाख वोटों से जीत दर्ज की थी।  

दुर्गादास को कड़ी टक्कर दे रहे टेकाम 
2019 में मिली जीत के बाद दुर्गादास जनता के बीच निष्क्रिय हो गए। संगठन में सक्रिय हैं और नेताओं को साधकर चलते हैं, लेकिन पूरे पांच साल पार्टी कार्यकर्ताओं से दूर रहे। लोगों से भी उनका बहुत संपर्क नहीं रहा। दूसरी ओर कांग्रेस के रामू टेकाम लगातार संपर्क में रहते हैं, लेकिन मोदी और राम लहर के चलते एक बार फिर वह भाजपा से पिछड़ते दिख रहे है। हालांकि टेकाम इस बार कड़ी टक्कर दे रहे हैं। जीतें या नहीं, लेकिन पिछले बार जैसी बुरी हार तो नहीं होगी।  

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