प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि पांच महीने से अधिक की आयु वाले गर्भस्थ शिशु को कानूनी रूप से एक स्वतंत्र 'व्यक्ति' माना जाएगा।
अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि यदि किसी दुर्घटना या लापरवाही के कारण गर्भस्थ शिशु की मृत्यु होती है, तो उसे केवल माता के शरीर का अंग मानकर नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि उसके लिए अलग से मुआवजे का भुगतान करना अनिवार्य होगा।
कानूनी परिभाषा में 'व्यक्ति' माना गया गर्भस्थ शिशु
हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान व्यक्ति की परिभाषा को व्यापक विस्तार दिया है। अदालत का तर्क है कि पांच माह के पड़ाव को पार करने के बाद गर्भ में पल रहा शिशु एक स्वतंत्र अस्तित्व की ओर बढ़ जाता है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि इस अवस्था के बाद शिशु में जीवन के स्पष्ट लक्षण होते हैं, इसलिए कानून की नजर में उसे एक जीवित इकाई के रूप में देखा जाना चाहिए। यह फैसला अजन्मे बच्चों के जीवन के अधिकार को एक मजबूत कानूनी आधार प्रदान करता है।
शिशु की मृत्यु पर अब मिलेगा दोहरा मुआवजा
अदालत ने मोटर वाहन दुर्घटना और अन्य क्षति के मामलों में मुआवजे की गणना के लिए नए निर्देश जारी किए हैं। अब तक की व्यवस्था में गर्भस्थ शिशु की हानि को अक्सर माता की शारीरिक क्षति का हिस्सा माना जाता था।
लेकिन नए आदेश के अनुसार, यदि किसी हादसे में गर्भवती महिला के बच्चे की जान जाती है, तो दोषी पक्ष या बीमा कंपनी को महिला के उपचार के साथ-साथ मृत शिशु के लिए भी पृथक मुआवजे की राशि तय करनी होगी। कोर्ट का मानना है कि एक संभावित जीवन की क्षति की भरपाई कानूनन जरूरी है।
मानवीय गरिमा और अधिकारों का संरक्षण
इस फैसले के माध्यम से अदालत ने मानवीय गरिमा और अजन्मे बच्चे के अधिकारों के बीच एक गहरा संबंध स्थापित किया है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता और दीवानी कानूनों के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए, विकास के उस चरण में पहुंच चुके शिशु को सुरक्षा मिलनी चाहिए जहाँ वह जीवित रहने की क्षमता रखता है।
यह निर्णय न केवल कानूनी पेचीदगियों को दूर करता है, बल्कि समाज में अजन्मे शिशुओं के प्रति संवेदनशीलता और उनके अस्तित्व को मान्यता देने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
क्या था पूरा मामला
यह पूरा मामला 2 सितंबर 2018 का है, जब भानमती नामक एक गर्भवती महिला बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में चढ़ते समय गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। दुखद बात यह थी कि भानमती उस समय 8 से 9 महीने की गर्भवती थीं और इस हादसे में उनके गर्भस्थ शिशु की भी जान चली गई।
रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने महिला की मौत पर तो 8 लाख रुपये का मुआवजा मंजूर किया, लेकिन कोख में पल रहे शिशु की मृत्यु को नजरअंदाज कर दिया, जिसके खिलाफ परिजनों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की एकल पीठ का ऐतिहासिक रुख
अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने विभिन्न कानूनी सिद्धांतों और पूर्व के अदालती फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि जब गर्भस्थ शिशु विकास के उस चरण (5 माह से ऊपर) में पहुँच जाता है जहाँ वह जीवित रहने की क्षमता रखता है, तो उसे केवल माता के शरीर का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
अदालत ने माना कि कोख में पल रहा बच्चा भी एक स्वतंत्र जीवन है और उसकी मृत्यु को किसी भी अन्य बच्चे की मृत्यु के समान ही गंभीर माना जाना चाहिए।
रेलवे ट्रिब्यूनल के आदेश में बदलाव और दोहरा मुआवजा
हाईकोर्ट ने लखनऊ के रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल द्वारा 18 फरवरी 2025 को दिए गए आदेश में महत्वपूर्ण संशोधन किया है। अदालत ने आदेश दिया कि भानमती की मृत्यु के लिए दिए गए 8 लाख रुपये के अलावा, उनके गर्भस्थ शिशु की मृत्यु पर भी परिजनों को अलग से 8 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
इस फैसले ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि भविष्य में ऐसी किसी भी दुर्घटना में, जहाँ गर्भस्थ शिशु की हानि होती है, पीड़ित परिवार को दोहरी क्षतिपूर्ति मिल सकेगी।










