ट्रांसपोर्ट व्यापारी की इकलौती बेटी संतोष मालू 5 मार्च को जैसलमेर में सांसारिक जीवन त्यागकर संयम मार्ग अपनाने जा रही हैं। घर से विदाई लेते समय उन्होंने दीवार पर लिखा- ‘दासी नहीं रानी बनने जा रही हूं।’ यह पंक्ति अब उनकी पूरी आध्यात्मिक यात्रा का सार बन चुकी है।
जैसलमेर में लेंगी दीक्षा
संतोष को 5 मार्च को जैसलमेर में आचार्य भगवंत श्री जिन मणिप्रभ सूरीश्वर जी के करकमलों से जैन दीक्षा प्राप्त होगी। इस अवसर पर जैसलमेर में चादर महोत्सव भी आयोजित हो रहा है, जिसमें देशभर से सैकड़ों जैन साधु-संत उपस्थित हैं। ऐसे पावन सानिध्य में दीक्षा मिलना संतोष अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानती हैं।
बी.कॉम कर चुकीं हैं संतोष
संतोष बताती हैं कि उनके पिता रतनलाल मालू ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जुड़े हैं, जबकि माता सुशीला देवी गृहिणी हैं। वे इकलौती बेटी हैं और उनके तीन भाई हैं। बी.कॉम तक पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका सपना एम.कॉम करने का था, लेकिन कोरोना काल में बाड़मेर चातुर्मास के दौरान आचार्य भगवंत के सानिध्य ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
वह कहती हैं, “पहले दीक्षा का विचार नहीं था, लेकिन तपस्या और साधना में मन लगता था। धीरे-धीरे वैराग्य का भाव प्रबल होता गया और मन ही मन संयम जीवन का संकल्प ले लिया।”
4 साल का वैराग्य और 2000 किमी पैदल
पिछले चार वर्षों के वैराग्य काल में संतोष ने 8 माह का गुरुकुल वास किया। इस दौरान उन्होंने करीब 2 हजार किलोमीटर पैदल विहार किया और तप-तपस्या व साधना में समय बिताया। दीक्षा के निर्णय पर पिता ने जल्द सहमति दे दी, लेकिन मां को मनाने में समय लगा। आखिरकार परिवार ने भी उनकी भावना को स्वीकार कर लिया।
सांसारिक सुख क्षणिक
संतोष का कहना है कि सांसारिक जीवन में दिखने वाला सुख क्षणिक होता है। “वास्तविक आनंद केवल संयम और साधना में है। जैन समाज में जन्म लेना सौभाग्य है, लेकिन इस जीवन में कुछ श्रेष्ठ करेंगे तभी आगे के भाव सुधरेंगे।” सोशल मीडिया पर वह साफ कहती हैं, “वहां सिर्फ दिखावा है, वास्तविक शांति वहां नहीं मिलती।”
रानी’ बनने जा रही हूं
‘दासी नहीं रानी बनने जा रही हूं’ पर संतोष स्पष्ट करती हैं कि समाज में धारणा है कि शादी करके ही लड़की रानी बनती है और संयम जीवन में दासी। “लेकिन प्रभु के मार्ग पर चलने वाली हर आत्मा रानी है, दासी कोई नहीं होती,” वह मुस्कुराते हुए कहती हैं।










