विजयपुर उपचुनाव मामले में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट जाएगी। जीतू पटवारी ने कहा- लोकतंत्र और दलित-आदिवासी अधिकारों से खिलवाड़।

Vijaypur By-election: मध्यप्रदेश। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता विपक्ष उमंग सिंघार ने मंगलवार को विजयपुर उपचुनाव से जुड़े फैसले को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने बताया कि, कांग्रेस अदालत के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। जीतू पटवारी ने भाजपा को घेरते हुए कहा कि, कांग्रेस न्यायपालिका का सम्मान करती है लेकिन भाजपा लेकतंत्र के साथ खिलवाड़ कर रही है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने बताया कि, 'विजयपुर उपचुनाव के मामले में हम आज ही सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखेंगे। हमें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है कि सत्य और लोकतंत्र की रक्षा होगी, और दलित-आदिवासी समाज के अधिकारों के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।'

हारा हुआ प्रत्याशी विजेता घोषित
'पहले विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष, जो आदिवासी समाज से आते हैं, उन्हें “औकात” जैसे अपमानजनक शब्द कहकर अपमानित किया जाता है और अब एक हारे हुए प्रत्याशी को विजेता घोषित करवाने के लिए एक आदिवासी विधायक का निर्वाचन ही शून्य घोषित कर दिया गया। यह घटनाक्रम साफ दिखाता है कि दलित-आदिवासी समाज के सम्मान और लोकतंत्र की भावना के साथ BJP द्वारा खिलवाड़ किया जा रहा है।'

हाई कोर्ट का निर्णय आश्चर्यजनक
जीतू पटवारी ने यह भी कहा कि, 'विजयपुर उपचुनाव को लेकर माननीय उच्च न्यायालय का निर्णय आश्चर्यजनक है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी का दलित और आदिवासी विरोधी चेहरा बेनकाब कर दिया है।'

क्या है मामला विजयपुर उपचुनाव से जुड़ा मामला
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने श्योपुर जिले के विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 2 विजयपुर से विधायक के रूप में मुकेश मल्होत्रा ​​के चुनाव को रद्द कर दिया। इसकी बड़ी वजह नामांकन पत्र में आपराधिक मामलों की जानकारी को छिपाना था। अदालत ने इसे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भ्रष्ट आचरण माना। अदालत ने चुनाव याचिकाकर्ता रामनिवास रावत को निर्वाचन क्षेत्र से विधिवत निर्वाचित विधायक घोषित किया है।

यह फैसला न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया रावत द्वारा दायर एक चुनाव याचिका को स्वीकार करते हुए दिया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि मल्होत्रा ​​ने नामांकन पत्र के साथ फॉर्म 26 के तहत दायर किए जाने वाले आवश्यक हलफनामे में कई आपराधिक मामलों को या तो छुपाया या गलत तरीके से खुलासा किया, जिससे मतदाता एक सूचित चुनावी विकल्प बनाने के लिए आवश्यक सामग्री की जानकारी से वंचित हो गए।