भोपाल। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य क्षेत्र में अवैध रेत खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश और राजस्थान सरकारों पर कड़ी नाराजगी जताई है।
कोर्ट ने मामले में अपना फैसला 17 अप्रैल तक सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों ने स्थिति की गंभीरता को उजागर किया है।
शीर्ष कोर्ट ने किए तीखे सवाल
सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने राज्य सरकारों की भूमिका पर कड़े सवाल खड़े किए। एक हालिया घटना का जिक्र करते हुए बताया गया कि अवैध रेत ले जा रहा ट्रैक्टर एक वन रक्षक को कुचल गया। इस पर कोर्ट ने पूछा कि आखिर ऐसी गतिविधियां जारी कैसे हैं। जस्टिस मेहता ने नाराजगी जताते हुए कहा कि क्या अधिकारी स्थिति से अनजान हैं। उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या रिपोर्ट तब आएगी जब कोई बड़ा हादसा हो जाएगा। कोर्ट की टिप्पणियां प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करती हैं।
पुल पर मंडरा रहा खतरा
मामले में नियुक्त एमिकस क्यूरी ने बताया एक महत्वपूर्ण पुल खतरे में है। यह पुल मध्य प्रदेश और राजस्थान को जोड़ता है और रोजाना हजारों लोग इसका उपयोग करते हैं। जानकारी के अनुसार, पुल के 34 पिलरों में से 8 के आसपास की रेत गहराई तक निकाली जा चुकी है। यह खुदाई 25 से 50 फीट तक की बताई जा रही है, जो संरचना के लिए खतरा है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो बड़ा हादसा हो सकता है। इससे आम लोगों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सरकार ने दी जांच की जानकारी
मध्य प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने पक्ष रखा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनाई गई है। यह समिति एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। हालांकि कोर्ट ने इस देरी पर असंतोष जताया है। न्यायाधीशों का कहना था कि कार्रवाई समय रहते होनी चाहिए थी। देरी से रिपोर्ट आने पर स्थिति और बिगड़ सकती है।
रेत माफिया पर भी जताई चिंता
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रेत माफिया के बढ़ते प्रभाव पर भी चिंता व्यक्त की। बताया गया कि माफिया बिना डर के अवैध खनन कर रहे हैं। यहां तक कि सरकारी अधिकारियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं। यदि सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और बिगड़ सकती है। इस मामले ने प्रशासन और कानून व्यवस्था की चुनौतियों को उजागर कर दिया है।
अब 17 अप्रैल पर टिकी निगाहें
अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट के 17 अप्रैल को आने वाले फैसले पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि कोर्ट इस मामले में सख्त दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। साथ ही राज्यों को जवाबदेही तय करने के निर्देश भी मिल सकते हैं। यह मामला पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक सुरक्षा दोनों से जुड़ा है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। फिलहाल यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।










