जबलपुर। हाईकोर्ट ने नर्सिंग फर्जीवाड़े मामले में सख्त रुख अपनाया है। जबलपुर हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान उन छात्रों को राहत देने से इनकार कर दिया, जो अयोग्य कॉलेजों से मान्यता प्राप्त संस्थानों में स्थानांतरण की मांग कर रहे थे। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने कहा केवल छात्रों के भविष्य की चिंता पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जिन छात्रों ने न नियमित कक्षाएं कीं और न ही समुचित प्रशिक्षण प्राप्त किया, वे आगे चलकर मरीजों के जीवन के लिए खतरा बन सकते हैं।
छात्रों ने ट्रांसफर की लगाई गुहार
दरअसल, इटारसी के कुछ छात्रों ने अदालत में आवेदन देकर मांग की थी कि उन्हें स्थानीय स्तर पर ही मान्यता प्राप्त कॉलेजों में स्थानांतरित किया जाए। उनका कहना था कि उन्होंने 4 साल पहले अयोग्य संस्थानों में प्रवेश लिया था और अब ट्रांसफर न मिलने से उनका करियर प्रभावित हो रहा है। उन्होंने सामाजिक और आर्थिक कारणों का हवाला देते हुए दूसरे शहर जाने में असमर्थता भी जताई।
कोर्ट ने नहीं दी तत्काल राहत
छात्रों की दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने फिलहाल कोई राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले के व्यापक प्रभाव को ध्यान में रखना जरूरी है, क्योंकि यह सीधे तौर पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से जुड़ा हुआ है। इस लिए इस मामले की सुनवाई के दौरान इस बा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
साल 2022 से चल रहा मामला
यह मामला वर्ष 2022 में दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें नर्सिंग कॉलेजों में अनियमितताओं और फर्जीवाड़े के आरोप लगाए गए थे। इसके बाद अदालत ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। चिकित्सा शिक्षा विभाग के तत्कालीन मंत्री विश्वास सारंग के कार्यकाल से जुड़े इस मामले की अगली सुनवाई 9 अप्रैल को होगी।










