मध्य प्रदेश के आर्थिक अपराध अन्वेषण प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) में मामलों के निपटारे की रफ्तार बेहद धीमी है। 2020 से 2025 के बीच केवल 70 मामलों में फैसला हो सका, जबकि हजारों शिकायतें लंबित रहीं। कुछ मामलों में निर्णय आने में बेहद लंबा समय लगा।

भोपाल। आर्थिक अपराध अन्वेषण प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) में दर्ज मामलों की सुनवाई और जांच प्रक्रिया की गति को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। वर्ष 2020 से 2025 के बीच अदालतों में केवल 70 आपराधिक मामलों का ही अंतिम निर्णय हो सका है। इन मामलों में 40 आरोपियों को दोषी ठहराया गया है, जबकि 30 मामलों में आरोप सिद्ध ही नहीं हो पाए और संबंधित व्यक्तियों को बरी कर दिया गया। इस तरह देखा जाए तो सजा का प्रतिशत लगभग 57 फीसदी बैठता है, जो यह दिखाता है कि आधे से कुछ अधिक मामलों में ही अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में सफल रहा।

अधिकांश मामलों में 13 वर्ष का समय लगा
चौंकाने वाली बात यह है कि इन मामलों के निपटारे में औसतन 13 वर्ष 7 महीने का समय लगा। जबकि, कुछ पुराने प्रकरण तो दशकों तक लंबित रहे। उदाहरण के तौर पर अपराध क्रमांक 45/90 का फैसला करीब 33 साल बाद आया। इसी तरह 57/95 में 28 वर्ष, 24/96 में 29 वर्ष और 139/99 में 26 वर्ष बाद निर्णय सुनाया गया। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक अपराधों से जुड़े कई मामले लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में अटके रहे। 

कुछ मामलों में 1-2 साल में हुआ निपटारा
हालांकि, कुछ मामलों में अपेक्षाकृत तेजी भी देखने को मिली। अपराध क्रमांक 12/22 का निर्णय एक वर्ष में, 65/21 का दो वर्ष में और 43/21 का चार वर्ष में हो गया। यह जानकारी विधानसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में मुख्यमंत्री द्वारा दी गई। कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय ने ईओडब्ल्यू में दर्ज शिकायतों और उनके निपटारे की स्थिति को लेकर सवाल उठाया था। सरकार की ओर से दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 से 2025 के बीच ईओडब्ल्यू को कुल 19,338 शिकायतें प्राप्त हुईं। 

जनवरी में सामने आईं 437 नई शिकायतें
जनवरी 2026 में केवल एक महीने के भीतर 437 नई शिकायतें दर्ज की गईं। इस प्रकार 2020 से जनवरी 2026 तक कुल 19,775 शिकायतें विभाग के पास पहुंचीं। विभाग को मिली कुल शिकायतों में लगभग 2,624 मामलों को औपचारिक रूप से पंजीबद्ध किया गया, जो कुल शिकायतों का करीब 14 प्रतिशत है। वहीं 566 मामलों में अपराध दर्ज कर विधिवत जांच शुरू की गई। आंकड़े यह संकेत देते हैं कि बड़ी संख्या में शिकायतें या तो प्रारंभिक जांच में ही समाप्त हो गईं या वे एफआईआर के स्तर तक नहीं पहुंच सकीं।