भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा का बजट सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है। बजट सत्र को सबसे महत्वपूर्ण सत्र माना जाता है। बजट सत्र के दौरान राज्य की वित्तीय नीतियों, योजनाओं और खर्चों पर विस्तार से चर्चा होती है। इस बार का बजट सत्र न केवल सरकार के लिए, बल्कि विपक्ष के लिए भी अग्निपरीक्षा साबित होने वाला है। बजट सत्र में राज्य सरकार जहां अपनी नीतियों और फैसलों का बचाव करती दिखेगी, वहीं विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर सरकार को प्रभावी ढंग से घेरने का प्रयास करेगा।
भगीरथपुरा दूषित पेयजल मुद्दा उठना तय
राज्य में कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सरकार सवालों के घेरे में है। इंदौर के भगीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से 33 लोगों की मौत का मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। यह घटना सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था और जनस्वास्थ्य प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करती है। बजट सत्र के दौरान विपक्ष इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करेगा। इसके अलावा, सूबे के खजाने पर बढ़ते कर्ज के बोझ पर भी विपक्ष सरकार को घेरने का प्रयास करेगा।
आक्रामक रणनीति अपनाते दिख सकते हैं सिंघार
इसके अलावा, तराना में सांप्रदायिक झड़प के बहाने कानून-व्यवस्था की स्थिति पर विपक्ष राज्य सरकार को घेरने का प्रयास करेगा। विपक्ष के नेता उमंग सिंघार को दो वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन अब तक वे विधानसभा के भीतर सरकार को किसी बड़े मुद्दे पर घेरने में सफल नहीं रहे हैं। उम्मीद है वह इस सत्र में किस तरह राज्य सरकार को घेरने में कितने सफल होते हैं। कांग्रेस राज्य स्तर पर भी आक्रामक रणनीति पर आगे बढ़ने का प्रयास कर रही है।
सरकार के सामने गंभीर वित्तीय चुनौतियां
पिछले सत्र में कांग्रेस ने सदन के भीतर की बजाय बाहर धरना-प्रदर्शन पर ज्यादा ध्यान दिया था, जिससे सदन में बहस का असर सीमित रहा। सरकार के सामने गंभीर वित्तीय चुनौतियां हैं। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार राज्य को अपेक्षा से कम राशि मिलने की संभावना है। वहीं सरकारी कर्ज लगातार बढ़ रहा है और कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (डीए) के मुद्दे पर भी अब तक कोई स्पष्ट निर्णय नहीं हुआ है।
असहज कर सकता है मंत्री शाह का मामला
सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार में मंत्री विजय शाह के मामले में अपनाया गया रुख भी राज्य सरकार के लिए असहजता की स्थिति पैदा कर सकता है। इस प्रकार यह बजट सत्र राज्य सरकार के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। अब देखना यह है कि राज्य सरकार अपने कामकाज और नीतियों का कितनी मजबूती से सदन में बचाव करती है और विपक्ष जनता से जुड़े मुद्दों पर कितनी आक्रामकता के साथ सरकार को घेरती है।
