मध्यप्रदेश में चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा 40 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों पर सीधी भर्ती के परिणाम पर हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। नर्सिंग अधिकारियों की याचिका के बाद कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है।

जबलपुर। मध्यप्रदेश में चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा असिस्टेंट प्रोफेसर के 40 पदों पर की जा रही सीधी भर्ती की प्रक्रिया फिलहाल कानूनी दायरे में आ गई है। इन पदों के परिणाम पर हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश संजीव सराफ की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद पारित किया। अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले में अगली सुनवाई 18 मार्च को है।  

यह विवाद उन नर्सिंग अधिकारियों की याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने भर्ती प्रक्रिया को चुनौती दी है। जबलपुर की निशा चंदेल सहित 13 नर्सिंग ऑफिसरों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। उनका कहना है कि चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा लागू की गई नई भर्ती व्यवस्था से उनके पदोन्नति के अवसर लगभग समाप्त हो गए हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वे वर्ष 2004 से 2014 के बीच हाईकोर्ट स्टाफ नर्स अथवा नर्सिंग ऑफिसर के रूप में नियुक्त हुई थीं। 

याचिका में उन्होंने कहा सिस्टर ट्यूटर का पद उनके लिए फीडर कैडर माना जाता है। ऐसे में सीधे भर्ती के माध्यम से असिस्टेंट प्रोफेसर पद भरने से उनकी वरिष्ठता और प्रमोशन की संभावना प्रभावित हो रही है। याचिका में 21 मार्च 2024 की राजपत्र अधिसूचना को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस अधिसूचना के जरिए भर्ती नियमों में संशोधन किया गया, जिससे पदोन्नति की पारंपरिक व्यवस्था को कमजोर कर दिया गया। 

याचिका में उन्होंने तर्क दिया कि यह संशोधन सेवा नियमों की मूल भावना के विपरीत है और कर्मचारियों के अधिकारों का हनन करता है। इसलिए उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि जब तक मामले का अंतिम निर्णय न हो जाए, तब तक भर्ती परिणाम पर रोक लगाई जाए। हाईकोर्ट ने प्रारंभिक तौर पर याचिकाकर्ताओं के तर्कों को सुनने के बाद परिणाम जारी करने पर अस्थायी रोक लगा दी। 

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा। जवाब दाखिल होने के बाद ही इस मामले में आगे की कार्रवाई होगी। फिलहाल यह आदेश अस्थायी है, पर इससे भर्ती प्रक्रिया प्रभावित हुई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुयश मोहन गुरु ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि नई भर्ती नीति से लंबे समय से कार्यरत नर्सिंग अधिकारियों के कैरियर पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।