इंदौर। सस्ती टॉफी, लॉलीपॉप और चॉकलेट उत्पादन का इंदौर बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां कन्फेक्शनरी उद्योग इन दिनों गंभीर आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संकट का असर अब स्थानीय उद्योगों तक पहुंच गया है। इसका सीधा प्रभाव कन्फेक्शनरी सेक्टर पर पड़ा है, जहां उत्पादन में भारी कटौती देखी जा रही है। उद्योग से जुड़े कई इकाइयों ने अपने उत्पादन को लगभग आधा कर दिया है। मुख्य वजह कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि और सप्लाई चेन में आई बाधाएं हैं। इसके अलावा, एलपीजी के दाम बढ़ने से उत्पादन लागत और ज्यादा बढ़ गई है। बाजार में कीमत बढ़ाने के बावजूद मांग में गिरावट ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
बढ़ती लागत और घटती मांग का दोहरा दबाव
उद्योगपतियों का कहना है कि लागत में 10 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन बाजार में इतनी कीमत बढ़ाना संभव नहीं हो पा रहा है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ग्राहक कीमतों को लेकर बेहद संवेदनशील होते हैं। ऐसे में महंगे उत्पादों की बिक्री में तेज गिरावट आई है। पैकेजिंग सामग्री जैसे प्लास्टिक जार और रैपर की कीमतों में 40 से 50 प्रतिशत तक उछाल आया है। लिक्विड ग्लूकोज जैसे जरूरी कच्चे माल की लागत भी बढ़ गई है। इससे छोटे और मध्यम उद्योगों के मुनाफे पर सीधा असर पड़ा है।
छोटे उद्योगों पर सबसे ज्यादा असर
कई छोटे और मध्यम स्तर के कन्फेक्शनरी निर्माता इस स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। उन्हें बढ़ती लागत और कम मांग के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा है। कुछ इकाइयां अपनी क्षमता से काफी कम उत्पादन कर रही हैं। उद्योग में प्रतिस्पर्धा भी लगातार बढ़ रही है, जिससे स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो गई है। विशेष रूप से ग्रामीण बाजारों में मांग में आई गिरावट ने चिंता बढ़ा दी है। जहां पहले सस्ते उत्पादों की खपत ज्यादा थी, वहां अब बिक्री घट रही है। इसका असर रोजगार और उत्पादन दोनों पर पड़ सकता है।
राऊ-रंगवासा क्लस्टर पर भी पड़ा असर
इंदौर के राऊ-रंगवासा क्षेत्र में विकसित हो रहा कन्फेक्शनरी क्लस्टर भी इस संकट से अछूता नहीं है। यहां हाल ही में शुरू हुई करीब 15 इकाइयों को उत्पादन घटाना पड़ा है। पैकेजिंग सामग्री की कमी और बढ़ती लागत ने नई इकाइयों की रफ्तार धीमी कर दी है। इस क्लस्टर में लगभग 50 उद्योगों ने निवेश की योजना बनाई थी। करीब 200 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश पर भी अब असर पड़ सकता है। कुल 28.6 हेक्टेयर में फैले इस प्रोजेक्ट का भविष्य फिलहाल अनिश्चित दिख रहा है। यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो विस्तार योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
आगे की राह और उद्योग की उम्मीदें
इंदौर में 100 से अधिक कन्फेक्शनरी इकाइयां संचालित हो रही हैं। ये मुख्य रूप से ग्रामीण और छोटे शहरों के बाजारों को सप्लाई करती हैं। उद्योग को उम्मीद है कि आने वाले समय में हालात सामान्य होंगे। यदि कच्चे माल की कीमतें स्थिर होती हैं, तो उत्पादन फिर से बढ़ाया जा सकता है। सरकार से भी राहत और समर्थन की मांग की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सप्लाई चेन को मजबूत करना जरूरी है। तभी इस उद्योग को फिर से पटरी पर लाया जा सकेगा।









