इंदौर। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) की करीब 25 साल पुराना मेडिकल कॉलेज खोलने का सपना अब साकार होने की दिशा में आगे बढ़ गया है। राज्य सरकार ने इस प्रोजेक्ट को इसेंसिएलिटी सर्टिफिकेट जारी कर दिया है, जो किसी भी नए मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए जरूरी होता है। यह सर्टिफिकेट मिलने के बाद विश्वविद्यालय ने नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) को औपचारिक आवेदन भेज दिया है।
इंदौर के छोटा बांगड़दा में प्रस्तावित थी यह योजना
पहले यह परियोजना इंदौर के छोटा बांगड़दा क्षेत्र में प्रस्तावित थी, लेकिन वहां पर्याप्त भूमि उपलब्ध न होने के कारण सालों से अटकी हुई थी। मेडिकल कॉलेज स्थापित करने के लिए निर्धारित मानकों के अनुसार बड़े भू-क्षेत्र की जरूरत होती है, जबकि विश्वविद्यालय के पास वहां केवल 12 एकड़ जमीन ही शेष बची थी। इसी कारण प्रोजेक्ट को झाबुआ स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया।
नया परिसर बनने तक आरजीपीवी में चलेंगी कक्षाएं
झाबुआ आदिवासी बहुल और पिछड़ा जिला है। वहां मेडिकल कॉलेज खोलने से न केवल शिक्षा का विस्तार होगा, बल्कि स्था्नीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में भी बड़ा सुधार देखने को मिलेगा। झाबुआ में मेडिकल कॉलेज खोने के मेगा प्रोजेक्ट पर लगभग 1200 करोड़ रुपए की लागत आएगी। शुरुआत में इसकी कक्षाएं झाबुआ स्थित राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) में लगेंगी।
आरजीपीवी को दिए जाएंगे 60 करोड़ रुपए
आरजीपीवी के यूआईटी भवन में कक्षाएं लगाने के बदले आरजीपीवी को 60 करोड़ रुपए दिए जाएंगे। अगले दिनों में 100 एकड़ भूमि पर अत्याधुनिक परिसर विकसित किया जाएगा। विश्वविद्यालय की कोशिश है कि इस मेडिकल कॉलेज में 2026 सत्र से ही एमबीबीएस पाठ्यक्रम शुरु किया जा सके। भविष्य में यहां बीडीएस, आयुर्वेद और होम्योपैथी पाठ्यक्रम भी शुरू किए जाएंगे।
अब अपने ही क्षेत्र में डॉक्टर बन सकेंगे छात्र
आदिवासी अंचल के छात्रों को अपने ही क्षेत्र में डॉक्टर बनने का अवसर मिलेगा और जिला अस्पतालों को विशेषज्ञ चिकित्सकों तथा आधुनिक सुविधाओं का लाभ मिलेगा। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार, व्यापार और बुनियादी ढांचे के विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। इंदौर की 12 एकड़ जमीन चिकित्सा शिक्षा के लिए आरक्षित रहेगी। इसलिए वहां अन्य पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए अलग से अनुमति लेनी होगी।










