भोपाल। भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम के कामकाज में गंभीर अनियमितताओं और अधिकारियों की लापरवाही का खुलासा किया गया है। कैग की रिपोर्ट में बताया गया है कि सूक्ष्म और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए औद्योगिक क्लस्टरों के निर्माण में ठेकेदारों ने सरकारी खनिजों का इस्तेमाल किया, लेकिन उनसे संबंधित रॉयल्टी की उचित वसूली नहीं की गई। इससे राज्य के खजाने को भारी नुकसान उठाना पड़ा। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह स्थिति प्रशासनिक ढिलाई का स्पष्ट नमूना है।
बिना सत्यापन ठेकेदारों के बिल पास किए
रिपोर्ट के अनुसार, निर्माण कार्यों में ठेकेदारों ने रेत, पत्थर और अन्य खनिजों का उपयोग किया, जिन पर सरकार को रॉयल्टी मिलनी चाहिए थी। नियमों के मुताबिक, ठेकेदारों को खनिज खरीदने और रॉयल्टी भुगतान का पूरा विवरण देना होता है तथा संबंधित विभाग से नोड्यूज प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना जरूरी होता है। लेकिन कई मामलों में अधिकारियों ने बिना सत्यापन के ही ठेकेदारों के बिल पास कर दिए और केवल शपथ पत्र लेकर उन्हें भुगतान कर दिया। इससे यह पता ही नहीं चल सका कि खनिजों की खरीद वास्तव में कहां से की गई और रॉयल्टी का भुगतान हुआ या नहीं।
अनेक जरूरी प्रावधानों की अनदेखी
जांच में यह भी सामने आया कि निर्माण अनुबंधों में ठेकेदारों ने निर्धारित तकनीकी कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं की। अनुबंध की शर्तों के अनुसार हर परियोजना में ग्रेजुएट और डिप्लोमा इंजीनियरों की नियुक्ति अनिवार्य थी। ऐसा न करने पर प्रति माह जुर्माना लगना था, पर 57 में से कई अनुबंधों में यह नियम लागू नहीं किया गया और इससे 1.55 करोड़ का जुर्माना नहीं वसूला गया। काम समय पर पूरा न करने पर भी ढिलाई दिखाई। नियमानुसार काम तय समय सीमा में पूरा नहीं होता तो ठेकेदार पर प्रतिदिन 0.05% दर से जुर्माना लगाया जाना चाहिए जो अनुबंध राशि के 10 प्रतिशत तक हो सकता है।
धन और संसाधनों का सही उपयोग नहीं
29 परियोजनाओं में 87 दिन से 577 दिन की देरी होने के बाद भी 5.74 करोड़ रुपए का हर्जाना नहीं वसूला गया। कई मामलों में मामूली जुर्माना लगाया गया या बिल्कुल वसूली नहीं हुई। प्रयोगशाला स्थापित न करने पर जुर्माना लगाने, अनुबंध राशि को वास्तविक लागत से बहुत अधिक बढ़ा देना और निविदा प्रक्रिया में ब्लैकलिस्ट कंपनियों को काम देने जैसी कुछ और गड़बड़ियां की गईं। कुछ आपूर्तिकर्ताओं द्वारा सामान न देने पर भी उनकी सुरक्षा राशि जब्त नहीं की गई। प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की अनदेखी और निगरानी की कमी के कारण सरकारी धन और संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पाया।