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भोपाल। साल 2006 में हबीब तनवीर के नाटक ‘राजरक्त’ की पहली प्रस्तुति में मैंने पुरोहित का किरदार निभाया, आज 18 साल बाद पुन: उसी किरदार को निभाना मेरे लिए बड़े ही हर्ष का विषय है, यह कहना है थिएटर आर्टिस्ट रामचरन का, जो राष्ट्रीय देशज रंग महोत्सव के अतंर्गत मंचित नाटक ‘राजरक्त’ में करीब सौ से भी अधिक बार अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। गुरुवार को शहीद भवन में राष्ट्रीय देशज रंग महोत्सव का शुभारंभ हुआ, जिसमें पूर्वरंग में श्रीपर्णा सक्सेना द्वारा भरतनाट्यम नृत्य की प्रस्तुति दी गई इसके बाद हबीब तनवीर के नाटक ‘राजरक्त’ का मंचन किया गया।
शिव की सुंदर मुद्राओं का संयोजन नटेश कौथुवम
श्रीपर्णा सक्सेना द्वारा भरतनाट्यम प्रस्तुति के अंतर्गत तीन प्रस्तुतियां दी गर्इं, जिसमें उन्होंने गणेश वंदना..., से शुरूआत की। इसके बाद उन्होंने नटेश कौथुवम.... पर प्रस्तुति देकर दर्शकों की खूब तालियां बंटौंरी। भगवान शिव की स्तुति में तेज गति वाला टुकड़ा नटेश कौथुवम में नटेश यानी शिव की सुंदर मुद्राओं को नृत्य के रुप में दर्शाया जाता हैं। वहीं कौथुवम में, लयबद्ध शब्दांशों को गीत के बोलों के साथ जोड़ा जाता है। अंत में उन्होंने अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमोदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते..., पर भरतनाट्यम नृत्य प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया।
नाटक की कहानी
महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या के अगले क्रम में नया थिएटर द्वारा हबीब तनवीर के नाटक राजरक्त की प्रस्तुति दी गई। नाटक में निर्देशन रामचंद्र सिंह का रहा, रविंद्र नाथ टैगोर के विसर्जन और राजश्री पर आधारित राज रक्त धार्मिक और राजकीय सत्ता के बीच के संघर्ष को बताता नाटक है। जब राजा गोविंदा माणिक्य बकरे की बलि के खून से आहत होकर राज्य की पुरातन बलि प्रथा को प्रतिबंधित कर देते हैं तो, परंतु पुजारी रघुपति उनके आदेश को तोड़ने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। पुजारी का शिष्य जय सिंह भी अपने गुरु और देवी के प्रति निष्ठा रखता है साथ ही उसके भीतर राजा के प्रति गहरा सम्मान है और अर्पणा के प्रति उसके प्यार के बीच संघर्ष में फंस गया है।
