एम्स भोपाल के शोधकर्ताओं ने तीन साल के अध्ययन के बाद नैसोफैरिंक्स क्षेत्र में ट्यूबारियल ग्लैंड नामक नई लार ग्रंथि की पुष्टि की है। यह खोज सिर और गर्दन के कैंसर के इलाज के दौरान मुंह में लार सूखने की समस्या को हल कर सकती है।

भोपाल। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) भोपाल के चिकित्सकों ने मानव शरीर रचना विज्ञान से जुड़ी एक अहम खोज का दावा किया है। नाक के पीछे और गले के ऊपरी हिस्से के जोड़, जिसे नैसोफैरिंक्स कहा जाता है, में एक विशेष प्रकार की ग्रंथि के अस्तित्व को लेकर लंबे समय से वैज्ञानिकों के बीच मतभेद रहे थे। अब संस्थान की टीम ने करीब तीन वर्ष तक चले अध्ययन और परीक्षणों के बाद इस संरचना की पुष्टि की है। इसे ‘ट्यूबारियल ग्लैंड’ नाम दिया गया है और इसे सामान्य लार ग्रंथियों से अलग एक स्वतंत्र सलाईवा ग्रंथि बताया जा रहा है।

नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने जताया था अनुमान 
कुछ वर्ष पहले नीदरलैंड्स के शोधकर्ताओं ने इस संभावित ग्रंथि के होने की बात कही थी, लेकिन उसके ठोस प्रमाण सामने नहीं आ पाए थे। इसके बाद विश्व स्तर पर इस विषय पर अनुसंधान शुरू हुआ। एम्स भोपाल की टीम ने लगभग 150 संरक्षित शवों का प्रत्यक्ष विच्छेदन कर परीक्षण किया। इसके अलावा चुनिंदा नमूनों की सूक्ष्मदर्शी से जांच कर संरचना की पुष्टि की गई। इस प्रक्रिया से यह स्पष्ट हुआ कि यह ग्रंथि एक तय स्थान पर, नाक और गले के संगम क्षेत्र के पास मौजूद रहती है।

इसका आकार लंबवत व हल्के त्रिकोण जैसा
शोध में पाया गया कि इसका आकार लंबवत और हल्के त्रिकोण जैसा है। इसमें एक स्पष्ट नलिका भी देखी गई, जिसके माध्यम से स्राव बाहर निकलता है। सूक्ष्म अध्ययन में इसकी बनावट अन्य लार ग्रंथियों से मिलती-जुलती पाई गई। हालांकि इसके सटीक कार्य को लेकर अभी और अनुसंधान आवश्यक है, फिर भी यह खोज चिकित्सा विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलने की संभावना है। इसे प्रसिद्ध एनॉटमी संदर्भ पुस्तक ‘ग्रेड एनॉटमी’ में शामिल किया जा सकता है। 

कैंसर के इलाज में मिल सकता है लाभ 
उल्लेखनीय है कि एनॉटमी संदर्भ पुस्तक ‘ग्रेड एनॉटमी’ दुनियाभर में चिकित्सा शिक्षा का प्रमुख आधार मानी जाती है। अगर एम्स भोपाल के शोधकर्ताओं के इस काम को इस पुस्तक में जगह मिलती है तो यह मानव शरीर रचना के अध्ययन में एक नया अध्याय जोड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस खोज का व्यावहारिक लाभ खासकर सिर और गर्दन के कैंसर के उपचार में मिल सकता है। रेडियोथेरेपी के दौरान लार ग्रंथियां क्षतिग्रस्त होने से मरीजों को मुंह और गले में सूखापन जैसी समस्या होती है। 

नाक और गले की सर्जरी में भी उपयोगी
विशेषज्ञों का कहना है कि नई ग्रंथि की सटीक जानकारी मिलने से चिकित्सक उपचार के समय इसे सुरक्षित रखने की रणनीति बना सकते हैं। इसके साथ ही नाक और गले की सर्जरी में भी यह जानकारी ऑपरेशन को अधिक सुरक्षित बनाने में सहायक हो सकती है। इसके अलावा, भविष्य में इसके कार्य को बेहतर तरीके से समझने से ऊपरी श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के इलाज में भी नई दिशा मिल सकती है। इस लिहाज से भोपाल एम्स के शोधकर्ताओं का यह काम बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।