चिकित्सा जगत और पुलिस के आपसी तालमेल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जब इरादे नेक हों तो समय और दूरी जैसी बाधाएं बौनी हो जाती हैं। सोमवार सुबह रोहतक के पीजीआईएमएस (PGIMS) से दिल्ली तक एक विशेष 'ग्रीन कॉरिडोर' बनाया गया। इस आपातकालीन व्यवस्था के जरिए अंगों को 50 मिनट के रिकॉर्ड समय में रोहतक से दिल्ली बॉर्डर तक पहुंचाया गया, जिससे पांच गंभीर मरीजों को नई जिंदगी मिलना मुमकिन हो पाया।
120 किमी की रफ्तार से दौड़ी एम्बुलेंस
अंगों को समय पर अस्पताल पहुंचाने के लिए प्रशासन ने बेहद कड़े इंतजाम किए थे। रोहतक से दिल्ली सीमा तक के रास्ते को 'सिंगल लेन' में तब्दील कर दिया गया था। लगभग 100 पुलिसकर्मियों ने मोर्चा संभाला ताकि एम्बुलेंस बिना रुके निकल सके। एम्बुलेंस ने औसतन 120 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से दौड़ते हुए यह सफर तय किया।
सुबह 6 बजे सबसे पहले 'लीवर' को रोहतक पीजीआई से दिल्ली एम्स (AIIMS) के लिए रवाना किया गया। इसके बाद, सुबह 8:30 बजे किडनी भेजी गई। इसके साथ ही पैंक्रियाज और दोनों आंखों की कॉर्निया दान कर कुल पांच लोगों के जीवन में उजाला किया गया।
पीजीआईएमएस ने बनाया अंगदान का नया रिकॉर्ड
पीजीआईएमएस के कुलपति डॉ. एच.के. अग्रवाल ने बताया कि अंगदान को लेकर चल रही जागरूकता अब जमीन पर दिखने लगी है। पीजीआईएमएस ने महज तीन दिनों के भीतर दूसरा अंगदान करवाकर एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। डॉक्टरों की टीम ने रात भर मुस्तैद रहकर अंग निकालने की इस जटिल प्रक्रिया को पूरा किया।
सुबह 4 बजे से ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी
इस परोपकार के पीछे सोनीपत के गोहाना निवासी 51 वर्षीय कुलदीप सिंह के परिवार का साहसिक फैसला रहा। कुलदीप सिंह सुनारिया जेल में वार्डन (सिपाही) के पद पर तैनात थे। ब्रेन डेड घोषित होने के बाद उनके परिजनों ने 'सोटो' (SOTO) हरियाणा को अंगदान के लिए अपनी सहमति दी। सुबह 4 बजे से ही ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी।
संघर्षों भरी रही कुलदीप की बीमारी की यात्रा
कुलदीप की पत्नी प्रमिला ने बताया कि उनके पति पिछले 5 वर्षों से सुनारिया जेल में कार्यरत थे। करीब 11 महीने पहले उनकी आंख के पास दिक्कत हुई, जो बाद में ब्रेन ट्यूमर के रूप में सामने आई। दिल्ली के निजी अस्पताल में सर्जरी और लंबे इलाज के बाद भी उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। पिछले सोमवार को उन्हें रोहतक पीजीआई लाया गया था, जहां रविवार को उनका निधन हो गया। पीजीआई स्टाफ की प्रेरणा से परिवार ने समाज सेवा के लिए अंगदान का निर्णय लिया।
आर्थिक तंगी और सरकार से सहायता की गुहार
जहां कुलदीप के अंगों ने दूसरों को जीवन दिया, वहीं उनका अपना परिवार आर्थिक बदहाली के कगार पर है। प्रमिला ने बताया कि 11 महीने तक दिल्ली में इलाज के दौरान उन्हें पुलिस प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली। पिछले 4 महीनों से कुलदीप की सैलरी भी बंद है, जिसके कारण परिवार पर कर्ज चढ़ गया है।
परिवार की प्रमुख मांगें
• बिलों का भुगतान : सरकार उनके मेडिकल के सभी बिल पास करे ताकि कर्ज उतारा जा सके।
• बच्चों को नौकरी : कुलदीप का बेटा पारुल और बेटी तनु अभी पढ़ाई कर रहे हैं, परिवार ने दोनों बच्चों के लिए सरकारी नौकरी की मांग की है।
अंगदान की इस मिसाल ने जहां व्यवस्था और संवेदनाओं का संगम दिखाया है, वहीं यह शहीद समान सेवा देने वाले कर्मचारियों के परिवारों की सुरक्षा पर भी सवाल उठाता है।
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