दिल्ली विश्वविद्यालय के साहित्य उत्सव के उद्घाटन सत्र में आज पूरे छह अंतरे का वंदे मातरम् गाया गया। इस दौरान सभी देशभक्ति में डूबे नजर आए। उधर, मौलाना अरशद मदनी ने इस फैसले को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में साहित्य उत्सव के उद्घाटन सत्र में पूरे छह अंतरे का राष्ट्रगीत वंदे मातरम् गाया गया। 3 मिनट 10 सेकेंड के राष्ट्रगीत की अवधि के दौरान हर कोई देशभक्ति में डूबा नजर आया। बता दें कि गृह मंत्रालय ने बुधवार को आदेश जारी कर सभी सरकारी कार्यक्रमों और स्कूलों समेत अन्य औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम् के गायन को अनिवार्य किया था। 

डीयू में साहित्य उत्सव का उद्घाटन आज गुरुवार को हुआ है। उद्घाटन सत्र की शुरुआत वंदे मातरम् के गायन से हुआ। इस दौरान कुलगुरु प्रोफेसर योगेश सिंह, डीयू कल्लचर काउंसिल के चेयरपर्सन और दिल्ली यूनिवर्सिटी लिटरेचल फेस्टिवल कोर कमेटी के वाइस चेयरपर्सन और कन्वीनर अनूप लाठर समेत अन्य पदाधिकारी और छात्र मौजूद रहे। 

मौलाना अरशद मदनी बोले- यह धार्मिक स्वतंत्रता का हनन

उधर, सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम गाए जाने को अनिवार्य करने पर मौलाना अरशद मदनी भड़क गए हैं। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य महत्वपूर्ण आयोजनों में राष्ट्रगीत अनिवार्य किया गया है। यह न केवल एक पक्षपातपूर्ण फैसला है बल्कि नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर भी गहरी चोट पहुंचाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि देश का संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन इससे छेड़छाड़ करने का प्रयास किया गया है। 

फैसले को चुनावी रणनीति का हिस्सा बताया

मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह फैसला चुनावी रणनीति का हिस्सा लगता है। राष्ट्रगीत अनिवार्य करने के पीछे की वजह यह है कि जनता को जरूरी मुद्दों से गुमराह किया जा सके। उन्होंने कहा कि हमें वंदे मातरम् गाने या किसी समारोह में इसकी धुन बजाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन बतौर मुसलमान हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि हम मुसलमान केवल और केवल अल्लाह की इबादत करते हैं और अपनी इस इबादत में किसी को भी शामिल नहीं कर सकते।