ट्रायल कोर्ट ने 23 साल पहले उसे डकैती मामले में दोषी करार दिया था। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को राहत देते हुए दोषसिद्धि और सजा निलंबित करने का फैसला सुनाया है।

18वीं सदी के अंग्रेजी न्यायविद विलियम ब्लैकस्टोन ने कहा था कि भले ही 99 अपराधी छूट जाएं, लेकिन किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। ऐसे में पुलिस विभाग की जिम्मेदारी बनती है कि जांच के दौरान ऐसी कोई कोताही न बरते, जिसकी वजह से निर्दोष को जेल काटनी पड़ी। ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां डकैती मामले में दोषी करार शख्स को अब बरी किया गया है।

ट्रायल कोर्ट ने 23 साल पहले उसे डकैती मामले में दोषी करार दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने डकैती मामले में दोषी को बरी करने का फैसला सुनाया है। जस्टिस विमल कुमार यादव की कोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा निरस्त करते हुए कहा कि अभियोजना पक्ष आरोपी की आईडेंटिफिकेशन परेड विश्वसनीय नहीं थी। अदालत ने कहा कि बिना पहचान के आपराधिक कानून का उपयोग नहीं रह जाता है। आप किसी भूत को या किसी बेकसूर व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। 

बचाव पक्ष ने रखी थी ये दलीलें 

बचाव पक्ष ने दलील रखी थी कि ट्रायल कोर्ट ने डकैती की घटना की शिकायत दर्ज कराने वाले और गवाहों के बयानों पर उसे दोषी ठहराया गया था। बचाव पक्ष ने तर्क रखा कि आरोपी गवाहों को नहीं जानता था और न ही जो सबूत पेश किए गए, वह भी विश्वसनीय नहीं हैं। वहीं, तर्क दिया कि शिनाख्त परेड में भी लापरवाही की गई। बचाव पक्ष ने दलील रखी कि इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए राहत मिलनी चाहिए। 

अदालत ने माना, शिनाख्त परेड में हुई लापरवाही

अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि शिनाख्त परेड में लापरवाही पाई गई है। पुलिस ने आरोपी के मुंह को ठीक से नहीं ढका, जिस वजह से गवाहों को शिनाख्त परेड से पहले उसके चेहरे को देखने का मौका मिला या नहीं, पुख्ता तौर पर कहा नहीं जा सकता। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश बरामदगी साक्ष्य पर भी संदेह जताया और इन सभी आधार का हवाला देते हुए संदेह लाभ देकर अपीलकर्ता दोषसिद्धि और सजा निलंबित करने का फैसला सुनाया है।