नौशाद अहमद - सूरजपुर। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में सीबीएसई सिटी कोऑर्डिनेटर और साधु राम विद्या मंदिर के प्राचार्य प्राभाकर उपाध्याय ने परीक्षा तनाव, अंक-केन्द्रित सोच और कौशल आधारित शिक्षा को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि परीक्षा जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का एक चरण है, जिसे अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
परीक्षा को बोझ नहीं, सीखने का अवसर मानें
प्राभाकर उपाध्याय ने कहा कि आज के समय में विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक सभी परीक्षा को लेकर अत्यधिक तनाव में रहते हैं। अक्सर अंक सफलता का पैमाना बन जाते हैं, जबकि वास्तव में परीक्षा केवल ज्ञान और क्षमता का आकलन करने का माध्यम है।
कौशल विकास ही भविष्य की सफलता की कुंजी
उन्होंने बताया कि अच्छे अंक ही सफलता की गारंटी नहीं हैं। संचार कौशल, समस्या समाधान, रचनात्मक सोच, नेतृत्व, टीमवर्क और तकनीकी दक्षता जैसे जीवन कौशल विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करते हैं। नई शिक्षा नीति और CBSE भी इसी दिशा में अनुभवात्मक और प्रोजेक्ट आधारित अधिगम पर जोर दे रही है।
तुलना से बढ़ता है तनाव, अभिभावकों की अहम भूमिका
उपाध्याय ने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों की तुलना अन्य विद्यार्थियों से न करें। तुलना से आत्मविश्वास कम होता है। उन्होंने कहा कि बच्चों को प्रोत्साहन, सकारात्मक माहौल और उनकी मेहनत की सराहना देना सबसे जरूरी है।
विद्यालयों को समग्र विकास पर करना चाहिए काम
स्कूलों की जिम्मेदारी है कि वे केवल परिणामों पर ध्यान न दें, बल्कि योग, खेल, ध्यान और सह-पाठयक्रम गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों के मानसिक संतुलन और एकाग्रता को बढ़ाएँ।
डिजिटल उपकरणों का सीमित उपयोग आवश्यक
डिजिटल युग में मोबाइल और सोशल मीडिया विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और एकाग्रता को प्रभावित कर सकते हैं। परीक्षा अवधि में सीमित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग आवश्यक है। उन्होंने सलाह दी कि विद्यार्थी संतुलित दिनचर्या अपनाएँ- पर्याप्त नींद, पौष्टिक आहार, नियमित अध्ययन, छोटे ब्रेक, योग और ध्यान तनाव कम करने में मदद करते हैं।
नई मूल्यांकन प्रणाली में समझ और रचनात्मकता पर जोर
CBSE और NEP अब केवल रटने की प्रवृत्ति से आगे बढ़कर विश्लेषण, समझ, रचनात्मकता और व्यवहारिक ज्ञान पर ध्यान दे रहे हैं। विद्यार्थियों को अंकों के बजाय विषय को समझने और उसके जीवन में उपयोग पर ध्यान देना चाहिए।
अभिभावक-शिक्षक-विद्यालय का समन्वय जरूरी
उपाध्याय ने कहा कि, बच्चे तभी सफल हो सकते हैं जब अभिभावक, शिक्षक और विद्यालय मिलकर सकारात्मक वातावरण तैयार करें। परीक्षा को डर नहीं, बल्कि आत्ममूल्यांकन और आगे बढ़ने का अवसर माना जाना चाहिए।
