यशवंत गंजीर-कुरुद। पुलिस अनुविभागीय कुरुद अंतर्गत शांत दिखने वाले खेतों में इन दिनों फसलों की नहीं, बल्कि ‘हार-जीत’ की खुशबू आ रही है। भखारा थाना क्षेत्र एक बार फिर जुआरियों का अड्डा बन गया है। रामपुर की नहरें हों या कोसमर्रा, देवरी और लोहरपथरा के सुनसान खेत, हर तरफ ताश के पत्तों की गड़गड़ाहट है। चर्चा तो यह है कि पुलिस की पिछली रेड सिर्फ एक ट्रेलर थी, असली फिल्म तो अब होली के बाद रिलीज हुई है।
पिछली बार जब हरिभूमि डॉट कॉम में खबरें छपीं, तो पुलिस ने सिंघम बनकर दो-चार रेड मारी थी। सूत्रों की मानें तो पुलिस की कार्रवाई महज एक नियोजित ड्रामा बनकर रह गई है। आरोप लग रहे हैं कि साहबों के साथ ऐसी तगड़ी सेटिंग बैठी है कि पुलिस के जूते की आहट आने से पहले ही फड़ साफ हो जाता है। ग्रामीणों के बीच अब यह मजाक बन चुका है कि आखिर पुलिस और जुआरियों के बीच कौन सा ब्लूटूथ कनेक्शन है जो दबिश की खबर पहले ही लीक हो जाती है। सवाल यह है कि जब भी पुलिस की गाड़ी का सायरन बजता है, उससे पहले ही फड़ मिस्टर इंडिया की तरह गायब कैसे हो जाता है।
हाईटेक फड़ में शामिल है एक संगठित सिंडिकेट
यह कोई छोटा-मोटा खेल नहीं, बल्कि एक संगठित सिंडिकेट है। बताया जा रहा है कि रोजाना 40 से 50 बड़े खिलाड़ी यहाँ दांव लगाने पहुँच रहे हैं और फड़ संचालक रोजाना करीब 1 से 2 लाख रुपये तक की ‘नाल’ (कमीशन) डकार रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि यहाँ हारने वालों के लिए कर्ज का जाल भी बिछाया गया है। धमतरी और भिलाई से पहुँचे कुछ सफेदपोश फाइनेंसर मौके पर मौजूद रहते हैं, जो जुआरियों को कथित 10 प्रतिशत दैनिक ब्याज पर तुरंत नगद रकम उपलब्ध कराते हैं। यानी जुआरी भले बर्बाद हो जाए, पर महफिल आबाद रहनी चाहिए।
एसपी की चौखट पर अब सख्त कार्रवाई की उम्मीद
स्थानीय पुलिस की सुस्त कार्यशैली से तंग आकर अब जनप्रतिनिधियों ने मोर्चा खोल दिया है। मामला जल्द ही एसपी की मेज पर पहुंचने वाला है। नगर पंचायत भखारा के एक पार्षद ने नाम न छापने की शर्त पर विस्फोटक खुलासा किया है। उनके मुताबिक, पुलिस को सटीक लोकेशन देने के बावजूद नतीजा ज्यो का त्यों बना हुआ ही है। पुलिस पहुँचती है, तो वहाँ सिर्फ बीड़ी के टुकड़े और खाली डिस्पोजल मिलते हैं। क्या महकमे के अंदर ही कोई विभीषण बैठा है जो जुआरियों को लाइव लोकेशन भेजता है। अब उम्मीद की आखिरी किरण पुलिस अधीक्षक की चौखट है।
क्या भखारा पुलिस है लाचार
अब बड़ा सवाल यही है कि, क्या भखारा पुलिस वाकई लाचार है, या फिर ऊपर की कमाई ने कानून की आंखों पर पट्टी बांध दी है? बहरहाल, देखना यह है कि कप्तान का डंडा चलता है या जुआरियों की ये परियां ऐसे ही बेखौफ होकर नाचती रहेंगी।