गोरेलाल सिन्हा- गरियाबंद। करीब दो दशकों तक माओवादी हिंसा, मुठभेड़ और एंबुश की घटनाओं से जूझने वाला गरियाबंद जिला अब नक्सल मुक्त हो चुका है, लेकिन इसकी घोषणा होना बाकी है। जिला पुलिस का दावा है कि यहां सक्रिय सभी नक्सली या तो मारे जा चुके हैं या कहानी आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट आए हैं। हालांकि शासन के आधिकारिक रिकॉर्ड में जिला अब भी नक्सल-प्रभावित के रूप में दर्ज है और अंतिम घोषणा शासन स्तर पर होना शेष है। हालांकि सीमावर्ती ओडिशा में सक्रिय नक्सली संगठन पर पुलिस की नजर है क्योंकि गरियाबंद जिले का एक बड़ा एरिया ओडिशा से सटा हुआ है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, जिले में सक्रिय सेंट्रल कमेटी मेंबर बालकृष्ण और चलपति सहित कई हार्डकोर नक्सली मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं, जबकि एरिया कमेटी के सदस्य आत्मसमर्पण कर चुके हैं। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की निशानदेही पर जंगलों में छिपाकर रखे गए हथियारों का बड़ा जखीरा भी बरामद किया गया है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इससे जिले में नक्सली नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। हाल ही में 45 लाख रुपए के इनामी 9 हार्डकोर माओवादियों ने, जिसमें 6 पुरुष और 3 महिला शामिल हैं, उन्होंने हथियारों सहित आत्मसमर्पण किया। इनमें एसडीके और सीनापाली क्षेत्रीय समितियों के सचिव, डिविजनल समिति सदस्य और पार्टी सदस्य शामिल थे। सभी ने रायपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक अमरेश मिश्रा के समक्ष सरेंडर किया और एके-47, एसएलआर सहित 6 स्वचालित हथियार पुलिस को सौंपे। पुलिस अधीक्षक वेदव्रत सिरमौर ने बताया कि लगातार सुरक्षा दबाव और शासन की पुनर्वास नीति के प्रभाव से शेष सक्रिय माओवादी भी मुख्यधारा में लौट आए हैं।
नक्सल संगठन का सफाया हो गया है
गरियाबंद पुलिस अधीक्षक वेदव्रत सिरमौर ने बताया कि, गरियाबंद जिले में सक्रिय नक्सली संगठन का पूरी तरह से सफाया हो चुका है। सक्रिय नक्सली संगठन के सभी नक्सली या तो 7 मारे जा चुके हैं या आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट आए हैं। सीमावर्ती ओडिशा राज्य के बॉर्डर एरिया में नक्सलियों पर पुलिस की नजर रहेगी।
2006 से शुरू हुआ था लाल आतंक
साल 2006 में माओवादियों की आमद के साथ गरियाबंद लाल आतंक की चपेट में आ गया था। उदंती-सीतानदी, नगरी, उदंती, एसडीके और सीनापाली जैसी पांच क्षेत्रीय समितियां यहां सक्रिय थीं। वर्ष 2011 में एंबुश विस्फोट में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजेश पवार सहित 9 जवानों की शहादत जिले की सबसे बड़ी घटना रही, जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। वर्ष 2025 में भालूडीगी मुठभेड़ के बाद नक्सली समितियों का विलय और आत्मसमर्पण की प्रक्रिया तेज हुई। नवंबर 2025 में उदंती समिति के आत्मसमर्पण के साथ ही शेष सक्रिय माओवादी भी सामने आ गए। अब तक जिले में 28 माओवादी मुठभेड़ों में मारे गए, जबकि पीछा अभियानों में 3 अन्य ढेर किए गए। इस प्रकार कुल 33 माओवादियों का अंत हुआ है।
संयुक्त अभियानों ने तोड़ी कमर
जिला पुलिस, ई-30 टीम, छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल, विशेष कार्य बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और कोबरा बटालियन के संयुक्त अभियानों ने माओवादी ढांचे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। शासन की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत इनाम राशि, आवास, इलाज और रोजगार जैसी सुविधाओं ने भी माओवादियों को हिंसा का रास्ता छोड़ने के लिए प्रेरित किया।
ओडिशा डिविजन पर रहेगी नजर
हालांकि गरियाबंद में सक्रिय नक्सली संगठन खत्म हो चुके हैं, लेकिन पुलिस की नजर अब ओडिशा डिविजन कमेटी पर टिकी है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ओडिशा में सक्रिय अधिकांश नक्सली बस्तर क्षेत्र से जुड़े रहे हैं और पूर्व में इस रूट का उपयोग आवाजाही के लिए किया जा चुका है। इसी कारण बॉर्डर एरिया में पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स की सतत निगरानी जारी है। करीब 20 वर्षों तक लाल आतंक झेलने के बाद अब गरियाबंद अमन, सुरक्षा और विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है। जिले के जंगलों में शांति लौट आई है, लेकिन आधिकारिक रूप से नक्सल-मुक्त घोषित होने का इंतजार अभी बाकी है।










