गोपी कश्यप- नगरी। छत्तीसगढ़ में औषधीय पौधों की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का एक प्रभावी माध्यम बनकर उभर रही है। कम लागत और अधिक मुनाफे के कारण अब किसान पारंपरिक खेती से हटकर औषधीय फसलों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
वन विभाग द्वारा किसानों को निःशुल्क पौधों का वितरण किया जा रहा है, वहीं घरों की बाड़ी और शहरी क्षेत्रों में हर्बल गार्डन विकसित करने के लिए भी पौधे उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसके साथ ही वन क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर रोपण किया गया है, जिससे हरियाली और जैव विविधता को बढ़ावा मिल रहा है।
औषधि पादप बोर्ड की पहल रंग ला रही
वन विभाग अंतर्गत छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड की पहल से इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। वर्ष 2025-26 में राज्य की 11 नर्सरियों के माध्यम से 9 प्रकार के औषधीय पौधों के लगभग 2.8 करोड़ पौधे तैयार किए गए हैं, जो एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
इन पौधों में वच, ब्राह्मी, सतावर, गुंजा, अनंतमूल, मंडूकपर्णी, स्टीविया, कुलंजन और सर्पगंधा जैसे महत्वपूर्ण औषधीय पौधे शामिल हैं, जिनका उपयोग स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी हो रहा है।
सरकार दे रही सब्सिडी, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता
पौधों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले बीज और मदर प्लांट का उपयोग किया गया है, जिससे इनकी जीवित रहने की क्षमता अधिक बनी हुई है। सरकार द्वारा इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता भी प्रदान की जा रही है, जिससे ग्रामीणों के लिए यह एक स्थायी आजीविका का माध्यम बनता जा रहा है।
वन मंत्री केदार कश्यप ने इस उपलब्धि पर बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम और उपाध्यक्ष अंजय शुक्ला को बधाई देते हुए इसे ग्रामीण विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।
पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धति हो रही मजबूत : मरकाम
छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि, औषधीय पौधों की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि यह हमारी पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धति को भी मजबूत कर रही है। 2.8 करोड़ पौधों का उत्पादन हमारे लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
आने वाले समय में हम अधिक से अधिक किसानों को इससे जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने आगे बताया कि, बोर्ड द्वारा किसानों को प्रशिक्षण, पौधों की उपलब्धता और बाजार से जोड़ने की दिशा में लगातार कार्य किया जा रहा है, ताकि औषधीय खेती को एक सशक्त आर्थिक मॉडल के रूप में स्थापित किया जा सके।
(छत्तीसगढ़ के जिले, कस्बे और गांवों की खबरों के लिए हरिभूमि का "ई-पेपर" पढ़ें। यहां क्लिक करें "epaper haribhoomi" या प्लेस्टोर से "हरिभूमि हिंदी न्यूज़" App डाउनलोड करें।)









