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अक्षय तृतीया पर इस बार परंपरा, आस्था और तिथियों का अनोखा संगम देखने को मिला। जहां एक ओर गांव-गांव में ‘पुतरा-पुतरी’ विवाह की गूंज और ठाकुर देव की जयकार सुनाई दी।

यशवंत गंजीर- कुरुद। छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक पर्व ‘अक्ति’ (अक्षय तृतीया) पर इस बार परंपरा, आस्था और तिथियों का अनोखा संगम देखने को मिला। जहां एक ओर गांव-गांव में ‘पुतरा-पुतरी’ विवाह की गूंज और ठाकुर देव की जयकार सुनाई दी, वहीं दूसरी ओर तिथियों के फेर ने ग्रामीण अंचलों को दो मतों में बांट दिया है।

कुरुद क्षेत्र के कई गांवों में रविवार को ही पूजा-अर्चना, तर्पण और पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न कर लिए गए, जबकि प्रदेश के अन्य हिस्सों में उदया तिथि के आधार पर सोमवार को अक्ति मनाने की तैयारी जारी है। 

आज या कल: तिथि को लेकर असमंजस
पंचांग के अनुसार इस वर्ष अक्षय तृतीया की तिथि दो दिनों तक प्रभावी रहने से ग्रामीणों के बीच मतभेद की स्थिति बनी रही। 

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आज आयोजन: कुरुद सहित कई गांवों में पुतरा-पुतरी विवाह, खेत पूजा और तर्पण किए गए।

कल का मत: कुछ विद्वानों के अनुसार सूर्योदय तिथि के आधार पर मुख्य पर्व अगले दिन मनाया जाना उचित है।

ठाकुर देव की चौरी पर परंपरा का उत्सव
देवस्थलों पर सुबह से ही ग्रामीणों की भीड़ उमड़ी। किसानों ने दोने में धान, नारियल और हल-नागर का प्रतीक लेकर पूजा की और खेतों में जाकर प्रतीकात्मक जुताई कर कृषि सत्र की शुरुआत का संकेत दिया। बच्चों को ‘प्रतीकात्मक बैल’ बनाकर युवाओं द्वारा हल चलाने की परंपरा ने विशेष आकर्षण पैदा किया। यह दृश्य नई पीढ़ी को खेती और परंपरा से जोड़ने का जीवंत उदाहरण बना।

बीज संस्कार और नई उम्मीद
बैगा द्वारा अभिमंत्रित धान को किसान अपने खेतों में लेकर पहुंचे और बुवाई की रस्म निभाई। इसे आने वाले कृषि सीजन के लिए शुभ संकेत माना जाता है।

'सांझी' परंपरा: श्रम का सम्मान
अक्ति के दिन ‘सांझी’ परंपरा भी निभाई गई, जिसमें सालभर काम करने वाले मजदूरों को सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है। यह छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में श्रम के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।

मासूमों का उत्सव: पुतरा-पुतरी विवाह
गांव की गलियों में बच्चों ने गुड्डे-गुड़ियों का विवाह रचाया। तेल-माटी से लेकर भांवर तक की रस्में निभाई गईं। मोहल्ले के लोगों ने भी ‘टीकवन’ देकर इस आयोजन में सहभागिता निभाई, जिससे पूरे गांव में उत्सव का माहौल बना रहा। 

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पितरों को तर्पण, परंपरा का निर्वहन
जिन परिवारों में बीते वर्ष किसी सदस्य का निधन हुआ, वहां ‘अक्ति तर्पण’ कर पूर्वजों को जल अर्पित किया गया और खीर-पूड़ी का भोग लगाया गया।

आस्था बनी रही अडिग
तिथियों को लेकर असमंजस के बावजूद ग्रामीणों का उत्साह और आस्था कम नहीं हुई। किसानों के लिए ‘अक्ति’ केवल पर्व नहीं, बल्कि नई फसल, नई उम्मीद और समृद्धि की शुरुआत का प्रतीक है। बहरहाल चाहे अक्ति आज मनी हो या कल, लेकिन छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी यह परंपरा एक संदेश देती है, आस्था कभी क्षय नहीं होती।

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