छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए जातिगत, अपमानजनक और अंधविश्वास से जुड़े नामों वाले 12 गांवों के नाम बदलने का निर्णय लिया है।

यशवंत गंजीर- कुरुद। छत्तीसगढ़ की माटी से अब हीनभावना और सामाजिक संकोच की धूल साफ होने वाली है। राज्य सरकार ने एक युगांतकारी निर्णय लेते हुए प्रदेश के उन 12 गांवों के नाम बदलने का संकल्प किया है, जिनके नाम दशकों से वहां के निवासियों के लिए 'अदृश्य बेड़ियाँ' बने हुए थे। यह केवल शब्दों का हेर-फेर नहीं, बल्कि उन हजारों ग्रामीणों के आत्मसम्मान का पुनर्जन्म है, जो अपनी पहचान बताने में वर्षों से ग्लानि का अनुभव कर रहे थे।

​विद्रूपता से गरिमा की ओर
​अक्सर कहा जाता है कि, नाम में क्या रखा है? किंतु उन ग्रामीणों से पूछिए जिन्हें 'चमारपारा', 'भंगी बस्ती' या 'डोमटोला' जैसे जातिगत संकीर्णता वाले नामों के कारण सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ा। 'प्रेतनडीह' और 'टोनहीनारा' जैसे अंधविश्वास की गंध वाले नामों ने न केवल विकास की धारणा को प्रभावित किया, बल्कि वहां की नई पीढ़ी के मानस पटल पर भी हीनता के बीज बोए। सरकार का यह कदम इन विद्रूपताओं को मिटाकर एक 'सभ्य और समरस समाज' की नींव रखने का प्रयास है।

​सामाजिक पीड़ा का अंत
​प्रशासनिक गलियारों से छनकर आई रिपोर्टों ने उन मर्मस्पर्शी पिड़ाओं को उजागर किया है, जहाँ गाँव के नाम के कारण बेटियों के हाथ पीले होने में बाधा आती थी और युवाओं को रोजगार की दहलीज पर उपहास का पात्र बनना पड़ता था। ग्रामीण अब तक जिस 'नाम' को अपनी नियति मानकर ढो रहे थे, अब वह इतिहास के कूड़ेदान में दर्ज होने जा रहा है।

​पंचायतों के द्वार पर गौरवशाली और प्रेरणादायी नए नाम होंगे अंकित
यह निर्णय केवल प्रशासनिक संशोधन नहीं है, बल्कि यह उन कुरीतियों पर प्रहार है जो भाषा के माध्यम से समाज में भेदभाव जीवित रखती थीं। परिवर्तन की प्रक्रिया: संकल्प से सिद्धि तक ​राजस्व अभिलेखों और सरकारी राजपत्रों में इन नामों के विलोपन की प्रक्रिया तीव्र गति से गतिमान है। बहुत जल्द: अंधविश्वास और जातिवाद के प्रतीक नाम मिटा दिए जाएंगे। ​पंचायतों के द्वार पर गौरवशाली और प्रेरणादायी नए नाम अंकित होंगे। ​सरकारी दस्तावेजों में दर्ज नई पहचान ग्रामीणों के आत्मविश्वास का नया आधार बनेगी।

इन 12 गांवों की बदलेंगी नाम
सूत्रों के अनुसार जिन गांवों के नाम बदलने की प्रक्रिया चल रही है, उनमें प्रमुख रूप से चंडालपुर, नकटी, भंगी बस्ती, चमारपारा, डोमटोला, मेहरटोला, कटवारपारा, सुवरतला, कोलिहा, प्रेतनडीह, टोनहीनारा, चूहड़ा टोला शामिल हैं। छत्तीसगढ़ सरकार का यह कदम इस बात का प्रमाण है कि, विकास केवल सड़कों और पुलों तक सीमित नहीं होता। असली विकास वह है, जो मनुष्य को उसकी गरिमा और निजता का सम्मान वापस लौटा दे।