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झोलाछाप डॉक्टरों के चक्कर में पीठ पर साढ़े 10 किलो का ट्यूमर लेकर घूम रहे मरीज को 15 साल बाद इससे आंबेडकर अस्पताल के जनरल सर्जरी विभाग में मुक्ति मिली। 

रायपुर। झोलाछाप डॉक्टरों के चक्कर में पीठ पर साढ़े 10 किलो का ट्यूमर लेकर घूम रहे मरीज को 15 साल बाद इससे आंबेडकर अस्पताल के जनरल सर्जरी विभाग में मुक्ति मिली। मरीज इस ट्यूमर की वजह से शारीरिक के साथ सामाजिक बहिष्कार के कारण मानसिक पीड़ा भी भोग रहा था। 

जांजगीर-चांपा में रहने वाले इस 45 वर्षीय मरीज के इस ट्यूमर को देश में सबसे बड़ा माना जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि मेडिकल लिटरेचर में अब तक 8 किलो वजनी ट्यूमर निकालने का उल्लेख है। ट्यूमर की वजह से असामान्य हो चुके जीवन की पीड़ा से त्रस्त मरीज अपनी समस्या लेकर इलाज के लिए आंबेडकर अस्पताल पहुंचा था। 

Photo of a patient suffering from a tumor
 ट्यूमर से पीड़ित मरीज की तस्वीर 

डॉक्टरों ने उसकी सर्जरी की योजना बनाई
चिकित्सकों को मरीज ने बताया था कि,  15 साल पहले गले के पिछले हिस्से में गांठ बनी थी, जो धीरे-धीरे उसके जीवन का बोझ बनती चली गयी। मरीज के शरीर और जीवन के इस बोझ का दर्द डॉक्टरों ने समझा और डॉक्टरों ने उसकी सर्जरी की योजना बनाई।

इनकी भूमिका 
मरीज का क्लिनिकल मूल्यांकन,रेडियोलॉजिकल जांच, आवश्यक लैब परीक्षण, प्री-ऑपरेटिव असेसमेंट और बहु-विभागीय चिकित्सा तैयारी प्रारंभ की। इस ऑपरेशन को पूरा करने में जनरल सर्जरी की विभागाध्यक्ष डा मंजू सिंह एवं चिकित्सा अधीक्षक एवं लेप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. संतोष सोनकर की प्रत्यक्ष भूमिका रहा। उनकी टीम में सीनियर सर्जन डॉ. राजेंद्र रात्रे, सीनियर सर्जन डॉ. मयंक भूषण मिश्रा एवं सीनियर रेजिडेंट डॉ. प्रेक्षा जैन ने प्रमुख भूमिका निभाई। 

उठना-बैठना तक था मुश्किल
पंद्रह साल में उम्र की तरह बढ़कर साढ़े 10 किलो वजनी इस ट्यूमर की वजह से उसकी सामान्य जीवनचर्या भी प्रभावित होने लगी थी। धीरे-धीरे स्थिति ऐसी हो गई कि मरीज को चलने-फिरने, बैठने-उठने, सोने के साथ दैनिक जीवन के सामान्य कार्यों तक में अत्यधिक कठिनाई होने लगी थी। वह केवल शारीरिक कष्ट ही नहीं, बल्कि इतने बड़े ट्यूमर के कारण उसे मानसिक पीड़ा, सामाजिक असहजता और आत्मविश्वास में कमी जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा था।

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