Nitish Kumar JDU President: बिहार की सियासत में जो चर्चा हफ़्तों से चल रही थी, उस पर आज मुहर लग गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए अपना पर्चा भर दिया है। अब यह साफ़ है कि जेडीयू की चाबी किसी और के हाथ में देने के बजाय नीतीश ने उसे अपनी जेब में रखना ही बेहतर समझा।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस वक्त नीतीश को संगठन के 'सुप्रीम' बनने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके पीछे की कहानी इन तीन वजहों में छिपी है:
निशांत की 'पॉलिटिकल लॉन्चिंग' और ट्रेनिंग
सबसे बड़ी वजह है नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार। शांत रहने वाले निशांत ने जब से राजनीति में कदम रखने के संकेत दिए हैं, नीतीश कुमार एक पिता और एक नेता के तौर पर फिक्रमंद हैं। वे चाहते हैं कि निशांत को राजनीति का 'ए-टू-जेड' कोई और नहीं, बल्कि वे खुद सिखाएं। अध्यक्ष पद पर रहकर नीतीश अपने बेटे को संगठन की बारीकियां और पार्टी में उनकी जगह पक्की करने का काम बखूबी कर पाएंगे।
सत्ता छूटे पर संगठन न टूटे
नीतीश कुमार पहले ही कह चुके हैं कि वे मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ सकते हैं और राज्यसभा जा सकते हैं। ऐसे में अगर वे अध्यक्ष पद भी छोड़ देते, तो जेडीयू में उनका 'पावर पॉइंट' खत्म हो जाता। राजनीति में बिना पावर के रहना नीतीश को मंजूर नहीं। अध्यक्ष बने रहकर वे रिटायरमेंट के बाद भी पार्टी के फैसलों और बिहार की राजनीति में अपना दबदबा बनाए रखेंगे।
गुटबाजी पर 'ब्रेक' लगाने की मजबूरी
जेडीयू का इतिहास रहा है कि जब भी नीतीश के अलावा कोई और अध्यक्ष बना, पार्टी में 'दो फाड़' की नौबत आ गई। चाहे आरसीपी सिंह का दौर हो या ललन सिंह का, पार्टी के भीतर तलवारें हमेशा खिंची रहीं। नीतीश जानते हैं कि उनके अलावा कोई दूसरा चेहरा ऐसा नहीं है जिस पर पूरी पार्टी एकमत हो सके। पार्टी को बिखरने से बचाने के लिए 'चाणक्य' को खुद मैदान में उतरना पड़ा।