india world champion: 8 मार्च 2026... ये तारीख भारतीय क्रिकेट इतिहास में सदियों तक याद रखी जाएगी। इस दिन भारत ने टी20 वर्ल्ड कप जीतकर एक नया अध्याय लिखा। घर में किसी टीम ने पहली बार खिताब जीता और डिफेंडिंग चैंपियन के रुतबे को भी पहली ही मर्तबा किसी टीम ने बरकरार रखा। इस कामयाबी की खास बात यह रही कि पहली बार टीम इंडिया ने कोई बड़ा आईसीसी टूर्नामेंट ऐसे दौर में जीता, जब कोई मेगास्टार या सुपरस्टार बाकी खिलाड़ियों पर या टीम पर भारी नहीं था।
कप भले ही कप्तान सूर्यकुमार यादव ने उठाया, लेकिन यह जीत किसी एक खिलाड़ी की नहीं बल्कि पूरी टीम की थी। सूर्या ने शानदार कप्तानी की, मगर वे कपिल देव, एमएस धोनी या रोहित शर्मा जैसे बड़े करिश्माई कप्तानों की कैटेगरी में नहीं आते। वे सौरव गांगुली या विराट कोहली जैसी लार्जर देन लाइफ यानी 'विराट' छवि भी नहीं रखते। दिलचस्प बात यह है कि सूर्या ने कभी आईपीएल टीम की कप्तानी भी नहीं की और वे टेस्ट या वनडे टीम का हिस्सा भी नहीं हैं। इसके बावजूद उनकी कप्तानी में टीम अजेय नजर आई और ये सिर्फ इस टूर्नामेंट की बात नहीं।
भारतीय क्रिकेट में स्टार कल्चर खत्म
2024 में जब भारत ने पिछला टी20 विश्व कप जीता था, उसके बाद से कई बड़े बदलाव हुए। रोहित शर्मा, विराट कोहली जैसे दिग्गजों ने टी20 और टेस्ट से संन्यास लिया। भारतीय टी20 टीम में नए दौर की शुरुआत हुई लेकिन आगाज इतना धमाकेदार रहा जैसा शायद ही किसी ने सोचा होगा। टी20 विश्व कप 2026 में टीम में मौजूद बड़े नाम भी इस बार केंद्र में नहीं थे। हार्दिक पंड्या, जो कभी टीम के सबसे चमकदार सितारों में गिने जाते थे, अब टीम का सिर्फ एक हिस्सा हैं। वे पूर्व कप्तान जरूर हैं, लेकिन फिलहाल किसी नेतृत्व की होड़ में नहीं दिखते।
बुमराह भी एक तरह से मेंटॉर का रोल निभा रहे
दूसरी ओर जसप्रीत बुमराह टीम के अनुभवी स्तंभ बन चुके हैं- कुछ वैसा ही रोल जैसा कभी सचिन तेंदुलकर निभाते थे। बुमराह अब ड्रेसिंग रूम में एक मजबूत आवाज हैं, लेकिन वे टीम के 'सीईओ' नहीं बल्कि भरोसेमंद सलाहकार की तरह हैं। खिलाड़ी के साथ-साथ मेंटॉर का रोल निभा रहे। उनकी रेस किसी से नजर नहीं आ रहे। बुलंदियों के शिखर पर होने के बावजूद वो अपने क्राफ्ट को मांजने में अभी भी लगे हुए हैं।
इस टीम पर गंभीर की छाप दिख रही
इस पूरी टीम पर अगर किसी एक शख्स की छाप साफ दिखती है तो वो हैं हेड कोच गौतम गंभीर। यह टीम दरअसल गंभीर की सोच का नतीजा है। लंबे समय से भारतीय क्रिकेट के स्टार कल्चर के आलोचक रहे गंभीर ने हमेशा उन खिलाड़ियों का समर्थन किया जिन्हें अक्सर कम आंका जाता था।
पिछले दो सालों में गंभीर ने धीरे-धीरे अपनी टीम तैयार की। उन्होंने कुछ खिलाड़ियों को बाहर किया, कुछ को मौका दिया और कई खिलाड़ियों पर भरोसा बनाए रखा। अब यह टीम पूरी तरह उनकी सोच का अक्स बन चुकी है।
भारतीय क्रिकेट अब फुटबॉल मॉडल पर चल निकला
भारतीय क्रिकेट में पहले जीतने वाली टीमों को अक्सर उनके कप्तानों के नाम से पहचाना जाता था- कपिल डेविल्स, धोनी के धुरंधर या रोहित की सेना। लेकिन अब तस्वीर बदल रही। भारतीय क्रिकेट भी अब फुटबॉल की तरह उस मॉडल की ओर बढ़ता दिख रहा, जहां टीम की रणनीति और दिशा तय करने में कोच की भूमिका ही सबसे अहम होती है।
गंभीर के साथ इस बदलाव में चीफ सेलेक्टर अजीत अगरकर भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। दोनों मिलकर ऐसे फैसले ले रहे, जिनमें खिलाड़ी की लोकप्रियता या स्टारडम से ज्यादा टीम की जरूरत को तरजीह दी जा रही।
गंभीर ने गुमनाम सितारों को आगे बढ़ाया
गंभीर की सोच हमेशा से 'अनसंग हीरोज' (गुमनाम सितारों) के पक्ष में रही है। इसका एक दिलचस्प उदाहरण जुलाई 2025 में देखने को मिला, जब इंग्लैंड के द ओवल में आखिरी टेस्ट से पहले वे पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उस दौरान उन्होंने बताया कि वे अक्सर भगत सिंह की जीवनी पढ़ते हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने भगत सिंह के हीरो करतार सिंह सराभा का जिक्र भी किया था- एक ऐसा क्रांतिकारी जिसे इतिहास में कम याद किया जाता है।
गंभीर के लिए यह सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि एक सोच है कि कुछ लोगों को जरूरत से ज्यादा बताना या उनके इर्द-गिर्द ही पूरा सिस्टम खड़ा कर देना। यही बात उन्हें शुरू से ही भारतीय क्रिकेट में खटकती रही और वो गाहे-बगाहे इस पर बेबाक बोलते भी रहे।
कोच बनने के बाद उन्होंने अपने फैसलों से यह साफ कर दिया। लंबे समय तक खराब फॉर्म से जूझ रहे विराट कोहली और रोहित शर्मा को टीम से बाहर किया गया। इस फैसले पर खूब विवाद हुआ, लेकिन गंभीर अपने रुख पर डटे रहे।
इंग्लैंड दौरे पर शुभमन गिल नए सुपरस्टार के तौर पर उभरे, लेकिन टी20 वर्ल्ड कप से पहले खराब फॉर्म के कारण उन्हें भी टीम से बाहर कर दिया गया। यह साफ संदेश था कि अब टीम में किसी खिलाड़ी को इम्युनिटी नहीं मिलेगी। प्रदर्शन होगा और टीम के संयोजन के हिसाब से जगह बनेगी तो मौका मिलेगा, फिर चाहें वो कितना ही बड़ा खिलाड़ी क्यों न हो।
गंभीर कई बार आलोचना के बावजूद अपने फैसलों पर अडिग रहे। उन्होंने वॉशिंगटन सुंदर को लगातार मौके दिए और कुलदीप यादव को बाहर रखा। दिल्ली के तेज गेंदबाज हर्षित राणा पर भी उनका भरोसा बना रहा।
इसी तरह संजू सैमसन और अभिषेक शर्मा जैसे खिलाड़ियों को भी उन्होंने लंबा मौका दिया। अभिषेक ने टूर्नामेंट में लगातार तीन बार शून्य बनाया, लेकिन फाइनल में तेज अर्धशतक जड़कर भरोसे का जवाब दिया। गंभीर की यही खासियत है कि वो खिलाड़ियों को जब भरोसा देते हैं तो पीछे नहीं हटते हैं। ये भरोसा पहले कभी स्टार खिलाड़ियों को मिलता था, वो अब नवोदित खिलाड़ियों को भी मिल रहा। यही वजह है कि खिलाड़ी अपने हेड कोच पर पूरा विश्वास करते हैं और उनके फैसलों पर कोई शक नहीं करता।
टी20 वर्ल्ड कप की यह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं है। यह उस सोच की जीत है जो कहती है कि क्रिकेट सिर्फ सुपरस्टार्स का खेल नहीं है। यह एक टीम गेम है, जहां हर खिलाड़ी की हिस्सेदारी और भूमिका बराबर होती है। फिर चाहें वो शतक ठोके या सिर्फ एक चौके से टीम को जीत दिला दे।