Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

शंभूनाथ शुक्ल का लेख : मायावती कांग्रेस से इतनी नाराज क्यों

मायावती कांग्रेस से कुछ ज्यादा ही नाराज हैं। इसकी वजह भी है। कांग्रेस लगातार गरीबों और मजदूरों के पलायन को मुद्दा बना रही है। उत्तर प्रदेश में यह मायावती का वोट बैंक है। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उस समय के अध्यक्ष राहुल गांधी खुद उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से चुनाव हार गए थे, इसलिए उनका फोकस यूपी है।

बसपा का बड़ा ऐलान, अकेले लड़ेगी UP का विधानसभा चुनाव
X
मायावती

शंभूनाथ शुक्ल

बसपा सुप्रीमो मायावती कांग्रेस पर कुछ ज़्यादा ही आक्रामक होती जा रही हैं। शुक्रवार को उन्होंने ट्वीट किया कि राजस्थान की कांग्रेसी सरकार द्वारा कोटा से 12000 युवा-युवतियों को वापस उनके घर भेजने पर हुए खर्च के रूप में यूपी सरकार से 36.36 लाख रुपये और देने की जो मांग की है वह उसकी अमानवीयता को प्रदर्शित करता है। दो पड़ोसी राज्यों के बीच ऐसी घिनौनी राजनीति अति-दुखःद!

उनके इस ट्वीट से लग रहा है कि मायावती कांग्रेस से कुछ ज्यादा ही नाराज हैं। इसकी वजह भी है। कांग्रेस लगातार गरीबों और मजदूरों के पलायन को मुद्दा बना रही है। उत्तर प्रदेश में यह मायावती का वोट बैंक है। मायावती की अपनी सीमाएं हैं, वे इस समय इस वर्ग के लिए मददगार नहीं हो सकतीं, लेकिन कुछ भी हो कांग्रेस की तीन संपन्न राज्यों में अपनी सरकारें हैं और महाराष्ट्र में वह सत्ता में तीसरे नम्बर की हिस्सेदार है, झारखंड में भी सहयोगी है। उसके पास आवाज है और संसाधन भी। ऐसे में वह 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश और बिहार जहां 40 लोकसभा सीटें हैं, से बाहर गए मजदूरों की सुरक्षित घर वापसी को लेकर चिंतित दिख रही है। इससे मायावती बेचैन हैं। बसों का खेल करके कांग्रेस ने बड़ा दांव चल दिया है। पहले तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मजदूरों को ट्रेन किराया देने का खेल खेल। इसके बाद उत्तर प्रदेश जा रहे प्रवासी मजदूरों के लिए एक हज़ार बसें मुहैया करवाने की घोषणा कर दी। इस राजनीति का असर भाजपा से अधिक मायावती के वोट बैंक पर होना था, इसलिए उनका बिफरना स्वाभाविक है। इसलिए मायावती भी कांग्रेस के प्रति अछूत जैसा व्यवहार करने लगी हैं।

दरअसल उन सारी जगहों पर क्षेत्रीय राजनीतिक दल कांग्रेस को दुश्मन नंबर एक मान रहे हैं, जहां कांग्रेस फिर से उभरने की कोशिश कर रही है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और बिहार तथा मध्य प्रदेश में। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी मजदूरों को अपने पाले में लाने को प्रयासरत हैं। 23 मई को राहुल की मजदूरों के साथ बातचीत का वीडियो जारी हुआ। सरसरी तौर पर देखा जाए तो यह वीडियो मजदूरों के प्रति राहुल की ममता को दर्शाता है। मगर राजनीतिक दल समझ रहे हैं कि यह कांग्रेस की दूरगामी राजनीति है। कांग्रेस उस वर्ग के दिलों में प्रवेश कर रही है, जो वोट डालने के लिए कोसों की दूरी तय कर के पोलिंग बूथ पर पहुंचता है। इसलिए विरोधी दल इसे कांग्रेस की राजनीति बता रहे हैं। सत्य भी यही है। कांग्रेस अब समझ चुकी है कि सीधे-सीधे भाजपा की बराबरी कर पाना उसके लिए थोड़ा मुश्किल है, इसलिए विधानसभाओं के रास्ते वहां पहुंचा जाए। पिछले दो वर्षों में कांग्रेस की गैर भाजपा दलों से मिलजुल कर चालने की कूटनीति काफी हद तक सफल रही है।

अब बिहार में विस चुनाव निकट हैं, इसके बाद सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का चुनाव 2022 में है। कांग्रेस की नजर अब इन राज्यों पर है, यहां अगर वह अच्छा प्रदर्शन करती है तो वह अगले लोकसभा में मोदी को टक्कर देने की हैसियत में होगी। कांग्रेस के नेतृत्त्व को साबित करना होगा कि वह अब परिपक्व हो चला है। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उस समय के अध्यक्ष राहुल गांधी खुद उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से चुनाव हार गए थे। इसलिए उनका फोकस यूपी है। यही बात मायावती तथा अखिलेश यादव को अखर रही है।

जब तक मायावती और उनकी पार्टी बसपा उत्तर प्रदेश में है, उनके दलित वोट बैंक को भेदना मुश्किल है। हालांकि कांग्रेस ने चंद्रशेखर रावण को हवा देकर मायावती को कमजोर करने की कोशिश की थी। किंतु शाहीन बाग घटनाक्रम में चंद्रशेखर की हिस्सेदारी तथा उसके बाद दिल्ली के जामा मस्जिद, अजमेरी गेट, तुर्कमान गेट में जो तनाव, हिंसा व आगज़नी हुई, इसके फलस्वरूप उनकी गिरफ्तारी व सशर्त रिहाई। उसके बाद से वे लापता हो गए, इसलिए उनको मायावती का विकल्प मानना मूर्खता होगी। शायद इसीलिए कांग्रेस अपने स्तर पर इन दलित, वंचित वर्गों के लिए मुखर हुई। मजे की बात, जब तक मजदूर महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, पंजाब, राजस्थान से आ रहा था, कांग्रेस कुछ नहीं बोली, लेकिन जैसे ही वह दिल्ली, हरियाणा से यूपी में प्रवेश करने लगा, कांग्रेस की पीड़ा जाग उठी। उसे दरअसल उत्तर प्रदेश में ही राजनीति करनी थी। इसलिए बसों का खेल शुरू हुआ। ऊपरी तौर पर कांग्रेस कह सकती है कि यह भाजपा को चित करने की राजनीति है, लेकिन निशाना कौन है, यह मायावती समझ गईं। इसीलिए उन्होंने कांग्रेस की बस राजनीति का इतना अधिक विरोध किया कि कई बार तो वे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी दिखाई दीं।

यही कारण था कि पहले तो उन्होंने प्रियंका गांधी द्वारा एक हजार बसों को लगाने के मामले पर उनकी खिल्ली उड़ाई। उन्होंने कहा कि योगी सरकार ठीक काम कर रही है, उसे प्रियंका गांधी की खटारा बसें नहीं चाहिए। अब राजस्थान सरकार ने उत्तर प्रदेश से जिन 36.36 लाख रुपये के बस किराए की मांग की है, उसे लेकर मायावती ने कांग्रेस को सीधे सीधे अमानवीय और घिनौनी राजनीति करने वाला दल बता दिया है। जाहिर है मायावती के अंदर यह कटुता अपने वोट बैंक पर हो रहे हमलों से उपजी है। यह बस किराया उन छात्रों को यूपी वापस भेजने के लिए लगाई गई बसों के खर्च के रूप में मांगा गया है। वैसे राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार की इस मांग की सभी लोग निंदा कर रहे हैं। कांग्रेस के पास इसका कोई जवाब नहीं है।

Next Story