Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

हालात : कांग्रेस को खुदकशी से कौन रोकेगा

कांग्रेस का व्यवहार ऐसा कि मानो वे अभी भी केन्द्रीय सत्ता पर बैठे हैं। अभी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपशब्द कहने, अपमानित करने से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है।

हालात : कांग्रेस को खुदकशी से कौन रोकेगाकांग्रेस

कांग्रेस की खुदकशी कौन रोकेगा? कब तक कांग्रेस खुदकशी के रास्ते पर चलेगी? सत्ता से दूर होना इन्हें स्वीकार नहीं है, व्यवहार ऐसा कि मानो वे अभी भी केन्द्रीय सत्ता पर बैठे हैं। ये अभी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपशब्द कहने, अपमानित करने से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। जबकि यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेसी नरेंद्र मोदी को जितना अपशब्द कहते हैं, जितना अपमानित करते हैं, उतना ही वो मजबूत होकर उभरते हैं।

अभी-अभी दिल्ली में कांग्रेस शून्य की कमजोर स्थिति तक पहुंच गई। जहां कांग्रेस का पन्द्रह साल तक शासन रहा था, वहां पर शून्य तक पहंुच जाना बहुत बड़ा वैचारिक प्रश्न खड़ा करता है। लोकतंत्र में ऐसा उदाहरण कम ही देखने को मिलता है कि राजनीतिक शून्यता को प्राप्त करने के बावजूद भी खुशियां मनाई गई हों। अपनी हार से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता खुश थे। अरविन्द केजरीवाल कांग्रेस को ही हरा कर अपनी सत्ता कायम की थी। अब तो अरविंद जितना मजबूत होंगे उतना ही कांग्रेस कमजोर होगी? सबसे बडी बात यह है कि जब आपको केजरीवाल की जीत पर खुशी है तो फिर प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा और प्रभारी चाको से इस्तीफा क्यों लिया?

लोकतांत्रिक राजनीति में अति और अभियानी सक्रियता सक्रियता नुकसान देने वाली होती है। राजनीतिक सक्रियताओं में मुद्दे की पहचान जरूरी होती है। इस कसौटी पर देखेंगे तो फिर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की राजनीतिक नीति और दृष्टि बहुत ही कमजोर है, आत्मघाती है। दो-तीन तत्कालीक राजनीतिक मुद््दे बड़े ही महत्वपूर्ण रहे हैं, जिन पर चाकचौबंद राय बनाने की जरूरत थी। जैसे नागरिक अधिकार संशोधन विधेयक, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और धारा 370। इन तीनों राजनीतिक मुद्दे पर कांग्रेस की अल्पसंख्यकवादी सोच विकसित हुई। धारा 370 के संशोधन का विरोध करना इन्हें भारी पड गया। अभी-अभी कांग्रेस ने नागरिक अधिकार संशोधन विधेयक पर कांग्रेस ने आक्रमक विरोध किया है, यह भी परिलक्षित है। शाहीन बाग का कांग्रेस ने समर्थन किया है। जहां-जहां हिसक प्रदर्शन हुए वहां-वहां राहुल गांधी-प्रियंका गांधी जाकर समर्थन में खड़े हो रहे हैं। यह अच्छी बात है कि अगर किसी पर पुलिस जुल्म हुआ है, हौसला देना भी अच्छी बात है। पर विरोध प्रदर्शनों को हिंसक बनाने, हिंसा को हथकंडा बनाना की मानसिकता पर खामोशी पसार लेना भी अस्वीकार है।

लोकतंत्र में विरोध की राजनीति तब शक्तिशाली होती है, जब भाषा सभ्य हो। तथ्य और मुद्दे अगर स्पष्ट हैं तब भी रक्तरंजित भाषा लाभ हासिल करने से रोक देती है। जब कांग्रेस के शीर्ष श्रेणी का नेता कहते हैं कि हम सावरकर नहीं है जो माफी मांग लेंगे, हम मर जाएंगे पर मांफी नहीं मांगेंगे। जबकि आप सुपीम कोर्ट में गलत तथ्य देने पर माफी मांग चुके हैं। जब आप बोलते हैं कि बेरोजगारी से त्रस्त लोग मोदी की पिटाई करेंगे तब मोदी यह कह कर सहानुभूति लूट लेते हैं कि हम अपनी पीठ मजबूत कर रहे हैं, आप आइये और हम पर लाठियां बरसाइए। आपके हथकंडे से ही आपके उपर वार करने में नरेंद्र मोदी सफल हो जाते हैं। कांग्रेसी नेता जब नरेंद्र मोदी को अपमानित भाषा का शिकार बनाते हैं, तब पूरी कांग्रेस पार्टी अराजक श्रेणी में खड़ी हो जाती है।

यह सही है कि भाजपा लगातार प्रदेशों में हार रही है। पर कांग्रेस भाजपा के विकल्प के तौर पर खडी क्यों नहीं हो रही। महाराष्ट्र, झारखंड जैसे प्रदेशों में जहां भाजपा सत्ता से बाहर हो गई वहां कांग्रेस प्रथम स्थान हासिल क्यों नहीं कर पाई? बिहार और उत्तरप्रदेश में भी क्षेत्रीय दलों की पिछलगू होना पड़ रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि अल्पसंख्यक कांग्रेस के साथ क्यों नहीं हैं। दिल्ली में अल्पसंख्यक केजरीवाल के साथ क्यों गए। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, अल्पसंख्यक क्षेत्रीय दलों के साथ है। भाजपा से बहुंसख्यक वर्ग को वापस लाने की कोई नीति कहां है? आपको केजरीवाल से सीख लेने की जरूरत है। केजरीवाल ने हनुमान मंदिर जाकर हनुमान चालीसा पढ़कर भाजपा की हिन्दुत्व की शक्ति को हीन कर दिया और आपके जैसा हिन्दुत्व को ही कोसने और अपमानित करने का काम नहीं किया। अगर केजरीवाल भी आपकी तरह हिन्दुत्व को कोसता और सरेआम अल्पसंख्यक नीति का सिरमौर बनने की कोशिश करता तो फिर दिल्ली में भाजपा को आने से कोई रोक ही नहीं सकता था। आगे भी कांग्रेस खुदकशी करती रहेगी? अभी भी कांग्रेस की प्रथम श्रेणी के नेताओं में ऐसी दूरदृष्टि नहीं है जो कांग्रेस की खुदकशी को रोक पाने की शक्ति रखते हों। कांग्रेस के प्रादेशिक नेता और कार्यकर्ता तो अपनी बड़ी श्रेणी के नेताओं की खुदकशी की मानसिकता के शिकार हैं।

(वरिष्ठ लेखक विष्णु गुप्त की कलम से)

Next Story
Top