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रमेश ठाकुर का लेख : यूरिया की किल्लत या कालाबाजारी

व्रिकेता बेशक कोरोना संकट की दुहाई देते हों, पर हकीकत कुछ और ही है? किसानों की इस समस्या पर केंद्र व राज्य सरकारें भी गंभीर हैं। पर, जिला प्रशासन स्तर पर यूरिया की धड़ल्ले से कालाबाजारी हो रही है। ये सच है कि बीते के समय से यूरिया की देश में शाॅर्टेज है, लेकिन इसका फायदा बिचैलिए उठा रहे हैं। उनके यूरिया की आपदा अवसर जैसी हो रही है।

रमेश ठाकुर का लेख : यूरिया की किल्लत या कालाबाजारी
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रमेश ठाकुर

अन्नदाताओं को बाजारों से यूरिया खाद आसानी से उपलब्ध नहीं हो रही। यूरिया को लेकर उत्पन्न संकट का बिचैलिए और दलाल फायदा उठा रहे हैं। किल्लत की आड़ में जमकर कालाबाजारी हो रही है। फसलों को उगाने के लिए दूनी कीमतों पर किसान दलालों से यूरिया खरीदने को मजबूर हैं। मंडियों में पूरे-पूरे दिन खड़े होने के बाद भी उन्हें सरकारी कीमतों पर यूरिया मुहैया नहीं हो रही। यूरिया की कमी किसी एक प्रदेश में नहीं, बल्कि समूचे हिंदुस्तान में किल्लत है। ये समस्या गेहूं की बुआई से लेकर अभी तक जारी है।

व्रिकेता बेशक कोरोना संकट की दुहाई देते हों, पर हकीकत कुछ और ही है? किसानों की इस समस्या पर केंद्र व राज्य सरकारें भी गंभीर हैं। पर, जिला प्रशासन स्तर पर यूरिया की धड़ल्ले से कालाबाजारी हो रही है। ये सच है कि बीते के समय से यूरिया की देश में शाॅर्टेज है, लेकिन इसका फायदा बिचैलिए उठा रहे हैं। उनके यूरिया की आपदा अवसर जैसी हो रही है। यूरिया की जिले स्तर के अधिकारियों और डीलरों की मिलीभगत से होती कालाबाजारी और चिंतित करती है। कहने को तो बाजारों में स्टाॅक की कमी का रोना है, लेकिन ब्लैक में जितनी चाहो उतनी यूरिया चंद घंटों में मुहैया होती है।

बारिश के मौसम में किसान धान की फसलें लगाते हंै जो पूर्णरूप से यूरिया खाद पर निर्भर होती है। बात सिर्फ धान की ही नहीं, बल्कि अन्य फसलों में भी यूरिया की जरूरत प्रत्यक्ष रूप से होती है। यूरिया ऐसी खाद है जो किसी भी किस्म की फसल की उर्वरक उत्पादन क्षमता को दोगुना कर देती है। अन्य राज्यों के मुकाबले सिर्फ उत्तर प्रदेश में यूरिया की सबसे ज्यादा किल्लत है। किसान मंडियांे और यूरिया के अधिकृत व्रिकेताओं के पास चक्कर काटते हैं। पूरे-पूरे दिन दुकानों के पास खड़े रहते हैं। बावजूद इसके उन्हें यूरिया मुहैया नहीं होती। पीछे से यूरिया का जितना स्टाॅक आता है उसे गायब करके रातों-रात कालाबाजारी कर दी जाती है। इस तरह की शिकायतों के ढेर जिला प्रशासनों के पास लगे हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती। क्योंकि पूरे खेल में वह खुद इन्वाॅल्व हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में जब ये शिकायतें पहुंची तो उन्होंने गंभीरता से लिया। कई जगहों पर छापेमारी हुई, कई लोग नपे। लेकिन किसानों की समस्याओं का समाधान अभी भी नहीं हुआ। किल्लत पहले जैसी ही है। यूरिया की ब्लैकमार्केटिंग रोकने के वैकल्पिक उपाय किए जा सकते हैं, जिस तरह रसोई गैस के सिलेंडर का सब्सिडी वाला धन उपभोक्ता के बैंक अकाउंट में सीधे ट्रांसफर किया जाता है। वैसे ही किसान बाजार मूल्य पर यूरिया खरीदे और सब्सिडी की रकम उनके खातांे में पहुंचाई जाए। अगर ऐसा होता तो निश्चित रूप से इस कदम से यूरिया की कालाबाजारी रूकेगी। क्योंकि विगत कुछ वर्षों से यूरिया पर बाजारों में जमकर कालाबजारी बढ़ी है। सरकार के इस कदम से कालाबाजारी को रोकने में अप्रत्याशित मदद मिलगी। क्योंकि यदा-कदा निजी यूरिया के प्रतिष्ठिानों पर सरकारी छापों और यूरिया की बोरियां जब्त करने की तमाम अनगिनत घटनाएं इसकी हिस्सा रही हैं।

यूरिया की कालाबाजारी अब खुलेआम होने लगी हैं। यूरिया मौजूद होते हुए भी दुकानदार किसानों को यूरिया नहीं देतेे। पर, ब्लैक में उचित दामों पर तत्काल प्रभाव से मुहैया करवा देते हैं। यूरिया को लेकर एक खबर ऐसी भी है जिससे प्रशासन के होश उड़े हुए हंै। नेपाल से सटे उत्तरी बिहार और उत्तर प्रदेश के इलाकों में यूरिया की अंतरराष्ट्रीय तस्करी की खबरें मिली हंै। भारत से यूरिया को नेपाल में भेजा जा रहा है। क्योंकि वहां हिंदुस्तान सेे कई गुना ज्यादा दामों में बिकती है। यूपी सरकार ने इस मसले पर हाल में बड़ा सर्च अभियान भी चलाया था। फिलहाल विराम लगा है। यूरिया की घपलेबाजी में अधिकारियों की भूमिका प्रत्यक्ष रूप से सामने आ रही हैं।

यूरिया निर्मित कारखानों की स्थिति भी दयनीय होती जा रही है। सिर्फ उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार हर साल खाद कारखानों को करीब एक लाख करोड़ की सब्सिडी देती है, लेकिन कारखानों का बीस हजार करोड़ अभी बकाया है, इसलिए बड़ी संख्या में कारखाने बंद हो गए। कमोबेश, ऐसा ही हाल दूसरे राज्यों का भी है। यूरिया मैकिंग करने वाले प्रतिष्ठिानों की अपनी समस्याएं हैं, उनका कहना है कि सरकारें उन्हें अच्छा वातावरण नहीं दे पा रही हैं। तमाम तरह की बंदिशें लगा दी गईं हैं जिससे उन्हें काम करने में दिक्कतें हो रही हैं। उनकी इन सभी समस्याओं के निवारण के लिए केंद्र व राज्यों की हुकूमतों को ईमानदारी से गौर फरमाना होगा।

ऐसा भी नहीं कि यूरिया की कमी के पीछे कोई और दूसरा मकसद हो। जैसे कि सरकार खेतीबाड़ी योग्य भूमि की उपज क्षमता और उसमें पोषक तत्वों को बनाए रखने के लिए जानबूझकर खादों में कमी कर रही हो। वैसे, कई समय से केंद्र सरकार का जोर इस बात पर है कि देश के किसान आॅर्गेनिक खेती करें। पर, किसान ऐसी सलाहों पर ज्यादा गौर नहीं करते। गौर न करने के पीछे एक बड़ा डरावना सच छिपा हुआ है। जमीनें खेती के लायक रही ही नहीं। बिना खाद के फसलें नहीं उगाई जा सकती। यूरिया के बेहताशा प्रयोग ने जमीन की आत्मा को अंदर तक झकझोर दिया है। जमीन में बंजरपन इतना बढ़ गया है कि अब बिना खादों के फसलों को उगाना संभव नहीं?

इस स्थिति के पीछे एक डरावना अध्याय और छिपा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं आने वाली पीढ़ी कृषि भूमि से वंचित ही न रह जाए। समय की मांग है, हमें भविष्य में खेती को बचाने और फसली जमीन को जिंदा रखने के लिए रासायनिक और ऑर्गेनिक खाद का इस्तेमाल सोचसमझकर ही करना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो निश्चित है कि जमीन खेतीबाड़ी के लायक नहीं बचेगी? किसान ऐसे दूरगामी दुष्प्रणामों को भलीभांति जानते हैं। बावजूद इसके यूरिया को जमीन में झोकने से बाज नहीं आ रहे। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि यूरिया के अत्यधिक उपयोग से खेतों की उपज क्षमता लगाातर घट रही है। इसे तुरंत रोका जाए। लेकिन किसी तरह कोई सतर्कता नहीं दिखाई जाती।

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