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प्रभात कुमार रॉय का लेख : कश्मीर पर तुर्की की हिमाकत

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद में एक बार फिर से तुर्की ने पाकिस्तान की अंध हिमायत करते हुए कश्मीर विवाद को उठाया। यूएनएचआरसी के 46वें सत्र में तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुट कावोसोग्लू ने कहा कि तुर्की विवादित जम्मू-कश्मीर के विषय में भारत से गुजारिश करता है कि कश्मीर में लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त किया जाए। कश्मीर विवाद का निदान शांतिपूर्ण तौर तरीकों से किया जाना चाहिए और संयुक्त राष्ट्र को कश्मीर विवाद में दखल देना चाहिए। भारत का नज़रिया एकदम स्पष्ट रहा है कि वह किसी भी तीसरे पक्ष की दखलंदाजी को कदापि स्वीकार नहीं करता।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : कश्मीर पर तुर्की की हिमाकत
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

विश्वपटल पर कट्टरपंथी इस्लाम का चैपिंयन बनने की विकट ख्वाहिश रखने वाला मुल्क अब तुर्की बन गया है। कभी कट्टरपंथी इस्लाम की पगड़ी सऊदी अरब से सिर पर बंधी हुई थी। सऊदी अरब और उसके सहयोगी अरब राष्ट्रों ने उदारवादी इस्लाम की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) में एक बार फिर से तुर्की ने पाकिस्तान की अंध हिमायत करते हुए कश्मीर विवाद को उठाया। जिनेवा में यूएनएचआरसी के 46वें सत्र में तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुट कावोसोग्लू ने कहा कि तुर्की विवादित जम्मू-कश्मीर के विषय में भारत से गुजारिश करता है कि कश्मीर में लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त किया जाए। कश्मीर विवाद का निदान वस्तुतः शांतिपूर्ण तौर तरीकों से किया जाना चाहिए और संयुक्त राष्ट्र को कश्मीर विवाद में दखल देना चाहिए. कश्मीर विवाद के विषय में भारत का नज़रिया एकदम स्पष्ट रहा है कि वह किसी भी तीसरे पक्ष की दखलंदाजी को कदापि स्वीकार नहीं करता। यहां तक कि कश्मीर विवाद में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मध्यस्ता की पेशकश को भी भारत बाकायदा ठुकरा चुका है। जिनेवा में भारत के स्थायी मिशन में द्वितीय सचिव सीमा पुजानी ने कहा कि भारत के विरुद्ध निराधार और दुर्भावनापूर्ण दुष्प्रचार के लिए पाकिस्तान का लगातार विभिन्न मंचों का दुरुपयोग करना कोई नई बात नहीं है। पाकिस्तान द्वारा भारत पर अनर्गल और बेबुनियाद आरोप लगाना पर कोई नई बात नहीं है। भारत पर आरोप लगाने से पहले पाकिस्तान को अपने गिरेबान में भी झांक लेना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि ग्रीस की एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि पाकिस्तान का साथ देने के लिए तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन अपने भाड़े के जेहादियों को कश्मीर में दहशतगर्दी अंजाम देने के लिए रवाना कर सकते हैं। इसके लिए राष्ट्रपति एर्दोगन के सैन्य सलाहकार ने कश्मीर जेहाद को लेकर अमेरिका में सक्रिय एक आतंकी तंजीम के सरगना का सहयोग हासिल किया है। ग्रीस की पेंटापोस्टाग्मा नामक एक वेबसाइट पर प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की की हुकूमत अपने भाड़े की सादात नामक जेहादी तंजीम को कश्मीर में सक्रिय जेहादी आतंकवादियों की पांतों में शामिल किए जाने की तैयारी कर रहा है। दरअसल तुर्की दुनिया के पटल पर में अग्रणी इस्लामिक ताकत के तौर पर पेश करना चाहता है। ऐतिहासिक दौर में धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील रहा यूरेशियन मुल्क तुर्की की हुकूमत विगत कुछ वर्षों से अपने राष्ट्रपति एर्दोगन के नेतृत्व में इस्लामिक धर्मान्धता की प्रबल समर्थक हो गई है।

हाल ही में अजरबैजान बनाम आर्मीनिया की जंग में तुर्की द्वारा इस्लाम के नाम पर अजरबैजान का अंध समर्थन किया गया। इस्लामिक धर्मान्धता के गर्क डूबा हुआ तुर्की, वस्तुतः पाकिस्तान के साथ एकजुट होकर कश्मीर में जेहादी हिंसा फैलाने की साजिशें रच रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन ने इसकी जिम्मेदारी जेहादी तंजीम सादात को सौंप दी है। एर्दोगन का सैन्य सलाहकार अदनान तनरिवर्दी जेहादी तंजीम सादात का सरगना है। जेहादी तंजीम सादात के सरगना अदनान तनरिवर्दी ने कश्मीर में अपना आधार क्षेत्र तैयार करने के लिए कश्मीर में जन्मे सैयद गुलाम नबी फई को कश्मीर में तंजीम सादात का जेहादी सरगना नियुक्त किया है। सैयद गुलाम नबी फई पाक़ खुफिया एजेंसी आईएसआई की दौलत के दमखम पर भारत के खिलाफ भाड़े के जेहादियों को भर्ती करने के जुर्म में अमेरिका की जेल में दो साल की सजा भुगत चुका है।

एक ऐतिहासिक दौर में जबकि सोवियत-अफगान युद्ध चल रहा था, तब वर्ष 1988 में अमेरिकन सीआईए द्वारा कश्मीर घाटी में अफगान जेहादियों द्वारा गुरिल्ला जंग का आगाज अंजाम दिया गया। सऊदी अरब और इस्लामिक देशों के संगठन ओपेक ने कश्मीर में नृशंस आतंक बरपा करने वाले पाक़परस्त जेहादियों को बेशुमार पेट्रो डॉलर प्रदान किए। अमेरिका ने कश्मीर के बर्बर जेहादियों को बड़े पैमाने पर एके 47 राइफलें प्रदान की। उस वक्त जेहादी इस्लाम का परचम अमेरिका के प्रबल सहयोगी सऊदी अरब के हाथों में था, किंतु वर्ष 2001 में 9-11 को न्यूयार्क वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अलकायदा तंजीम द्वारा अंजाम दिए नृशंस आक्रमण ने अमेरिका का नज़रिया बुनियादी तौर पर बदलकर रख दिया। 14 नवंबर वर्ष 2001 को अमेरिका की कयादत में नॉटो फौजों द्वारा काबुल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया गया। कश्मीर में जारी पाक़ द्वारा प्रेरित और पोषित जेहादी आतंकवाद पर अमेरिका की कूटनीति तो परिवर्तित हो गई, किंतु पाकिस्तान द्वारा कश्मीर को जेहादी दहशतगर्दी द्वारा हड़प कर लेने की बदनीयत बदस्तूर कायम बनी रही। पाकिस्तान से अमेरिका की सैन्य सरपरस्ती तो समाप्त हो गई और इसके साथ ही सऊदी अरब भी पाकिस्तान की पैट्रो डॉलरों से इमदाद करने से विरत हो गया, किंतु पाकिस्तान को चीन और तुर्की की अंधी हिमायत बाकायदा जारी है। पहले मलेशिया भी चीन और तुर्की के साथ कंधा मिलाकर पाक के प्रबल समर्थन में उतरा था, किंतु अब काफी पीछे हट गया है।

कश्मीर में जेहादी आतंकवाद को परिपोषित करने के कारण पाकिस्तान को फाईनेंनशियल एक्शन टास्क फोर्स द्वारा ग्रे लिस्ट में डाला गया, किंतु पाक को ब्लैक लिस्ट में डाले जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान का आर्थिक दिवालियापन तो जग जाहिर हो गया है, किंतु कश्मीर में प्रॉक्सी वॉर संचालित करने करने के लिए पाक़ हुकूमत और डीपस्टेट फौज़ पूर्णतः कटिबद्ध है। पाकिस्तान की अस्सी फीसदी अर्थसत्ता पर भी पाक फौज़ का आधित्य स्थापित है, अतः पाक़ हुकूमत पर पाक़ फौज़ का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नियंत्रण कायम रहता है। पाक फौज़ का दबदबा कायम बना रहे, इसके लिए कश्मीर विवाद को हिंसक तौर पर जीवित बनाए रखना पाक़ फौज़ के लिए बेहद आवश्यक रहा है। विगत 32 वर्षों से कश्मीर की सरजमीं पर जेहादी प्राक्सीवॉर निरंतर जारी रही है और पहले अमेरिका और अब तुर्की और चीन इसे संचालित रखने के लिए पाकिस्तान की खुली हिमायत और मदद करते रहे हैं। कश्मीर विवाद में भारत के पक्ष में इन दो मुल्कों के अतिरिक्त समस्त विश्व खड़ा हुआ है। अमेरिका, यूरोप, रुस, जापान, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के सभी मुल्क आज भारत के साथ खड़े हैं। वर्ष 1979 से और निरंतर 42 वर्षों से अंतरराष्ट्रीय जेहादी आतंकवाद का दुर्ग बना हुआ, पाकिस्तान वस्तुतः विश्वपटल पर आजकल एकदम अलग-थलग पड़ा हुआ है। अभी वक्त शेष है कि पाकिस्तान के लिए कि जेहादी आतंकवाद का पूर्णतः परित्याग करके इंसानियत की सही राह पर आ जाए अन्यथा पाकिस्तान को बंगलादेश की तरह से अपने प्रांत बलूचिस्तान और सिंध से भी हाथ धोना पड़ सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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