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सीरिया बनेगा नए विश्व युद्ध की वजह!

सीरिया में हुए रासायनिक हमले को लेकर अमेरिका के तीखे तेवरों की वजह से यह खतरा बढ़ गया है।

सीरिया बनेगा नए विश्व युद्ध की वजह!

कई साल से गृह युद्ध की आग में जल रहा सीरिया कहीं एक और विश्व युद्ध की वजह तो नहीं बनने जा रहा है? तीन दिन पहले वहां के इडलिब राज्य में हुए रासायनिक हमले को लेकर अमेरिका के तीखे तेवरों की वजह से यह खतरा बढ़ गया है।

अभी तक यह साफ नहीं हुआ है रासायनिक हमला किसने किया है, परंतु अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और इजरायल सहित कई देशों ने जिस तरह इसके लिए सीरिया की बशर अल-असद सरकार को जिम्मेदार ठहराने की चेष्टा की है, उससे तनाव चरम पर पहुंच गया है।

असद सरकार पर यह एक तरफा तोहमत तब लगाई जा रही है, जबकि वहां की सेना साफ कर चुकी है कि उसने रासायनिक अस्त्रों का उपयोग नहीं किया है। न अतीत में उसने ऐसा किया है और न भविष्य में कैमिकल हथियारों के प्रयोग का उसका इरादा है।

यहां दरअसल, सवाल उठता है कि अगर सीरियाई सेना ने यह सब नहीं किया है तो किसने किया है, क्योंकि इन हमलों के लिए लड़ाकू जहाज का उपयोग किया गया है। कुल चार बम गिराए गए हैं, जिसमें बच्चों और स्त्रियों सहित सौ लोगों के दम घुटने से मारे जाने और हजारों के पीडि़त होने की खबर आई है।

इनमें से बहुतों को अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा है। नाटो के नेतृत्व में अमेरिकी और दूसरे देशों की सेना के अलावा वहां विद्रोहियों पर रूस की सेना की तरफ से भी हवाई हमले होते रहे हैं। यदि नाटो देश बशर अल असद सरकार को इसके लिए कटघरे में खड़ा कर रहे हैं और असद सरकार इनकार कर रही है तो फिर किसने विद्रोहियों पर रासायनिक हथियारों से हमला किया है?

ऐसे में शक की सुई रूसी सेना की तरफ घूम रही है, परंतु रूसी सेना ऐसे हथियारों का इस्तेमाल भला क्यों करेगी, जबकि इससे पहले उसे पारंपरिक हथियारों से वहां विद्रोहियों के खात्मे में कामयाबी मिलती रही है। सीरियाई सेना ने कहा है कि यह विद्रोहियों की करतूत भी हो सकती है, परंतु सवाल उठता है कि विद्रोहियों के पास लड़ाकू विमान कहां से आया?

क्या सीरिया के उन पड़ोसी देशों ने विद्रोहियों को लड़ाकू जहाज उपलब्ध कराए हैं, जो कई साल से आईएसआईएस को समर्थन देकर असद सरकार का तख्ता उलटने की फिराक में हैं। यह गुत्थी काफी उलझी हुई है, जिसकी गहन जांच-पड़ताल किए जाने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र संघ ऐसा कर सकता है, परंतु सीरिया मामले को सुलझाने में जिस तरह यूएन नाकाम सिद्ध हुआ है, उससे उसकी तरफ से निष्पक्ष जांच की अपेक्षा रखना सही नहीं होगा।

संभवत: संयुक्त राष्ट्र संघ से नाउम्मीदी के चलते ही अमेरिका की डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने चेतावनी दे डाली है कि अगर यूएन कोई कार्रवाई नहीं करता है तो उसे वहां सीधे हस्तक्षेप के लिए बाध्य होना पड़ेगा। ट्रंप सरकार का यही आक्रामक रुख इस पूरी समस्या को तीसरे विश्व युद्ध की ओर धकेल सकता है।

बरसों से वहां कई देशों की सेनाएं नाटो और अमेरिका की अगुआई में कार्रवाई कर रही हैं, परंतु न असद सरकार ने हथियार डाले और न विद्रोहियों ने। बल्कि बशर अल असद और रूस सरकार का आरोप रहा है कि अमेरिका विद्रोहियों की मदद ज्यादा करता रहा है ताकि असद सरकार का तख्ता पलटा जा सके। रूस की सीरिया में दखल की मुख्य वजह यही रही है कि वह किसी भी सूरत में अमेरिका और यूरोपीय देशों की इस मनौती को पूरा नहीं होने देना चाहता कि असद सरकार का अंत कर दिया जाए।

रूस को लगता है कि इसके बाद इराक की तरह जो भी इनकी कठपुतली सरकार सीरिया में सत्ता संभालेगी, वह इस पूरे क्षेत्र के लिए बेहद खतरनाक साबित होगी। दूसरे रूस इस पूरे इलाके में अमेरिका की और घुसपैठ बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। उसे लगता है कि इराक के बाद सीरिया। सीरिया के बाद टर्की और उसके बाद अमेरिका रूस के और निकट पहुंचने की कोशिश कर सकता है, जो अंतत: उसके (रूस) लिए खतरनाक साबित होगा।

इस पूरे क्षेत्र से रूस का दबदबा खत्म करने और तेल के कुओं पर कब्जा कर लेने के मकसद से ही अमेरिका इस अभियान को छेड़े हुए है। यदि रासायनिक हथियारों का आरोप असद सरकार के मत्थे मढ़कर अमेरिका ने हमला बोला तो रूस चुप नहीं बैठेगा। ऐसे में सीरिया का युद्ध बहुत बड़े पैमाने पर फैल सकता है, इसलिए जरूरी है कि जांच पूरी होने तक अमेरिका इस मामले में संयम बरते।

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