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कि मन अभी भरा नहीं...

मंगला रामचंद्रन/नई दिल्ली | UPDATED Dec 9 2017 11:59AM IST
कि मन अभी भरा नहीं...

सुधा और राधा जुड़वा बहनें थीं। इसके बावजूद दोनों के स्वभाव में बहुत फर्क था। एक ओर राधा जहां संवेदनशील और जीवन में प्यार-रिश्ते को महत्व देती थी, वहीं दूसरी ओर सुधा के लिए पैसे से बढ़कर कुछ नहीं था। क्या सुधा को कभी अपनी असंवेदनशीलता का अहसास हुआ? मानवीय रिश्ते में प्यार और संवेदनशीलता के महत्व को उकेरती कहानी।

सामने छोटी बहन का खत खुला पड़ा था। हवा में पन्ने फड़फड़ा रहे थे। उससे केवल दो घंटे छोटी। दोनों ही रूपवती हैं। एक का रूप शालीनता लिए लगता है, जबकि दूसरी अभिमान से भरी, नकचढ़ी लगती। अभिमान तो था ही उसे अपने रूप का और उस रूप को नए-नए तरीकों से सजाकर रखने का। छोटी बहन राधा अपने को सजाने-संवारने में वक्त जाया नहीं करती थी, पर लोग सुधा के बजाय राधा के आस-पास ही अधिक मंडराते। राधा से सबकी सहज पट जाती। सुधा से अधिकतर लोग थोड़ा भय खाते और दूरी बनाकर रखते। सुधा खुद भी सबसे घुल-मिल जाने के बजाय, दूरी बनाए रखना पसंद करती।

सुधा के सपने सतरंगी थे, वो आकाश में विचरण करती थी। खुद के लिए साधारण सपने तो वो देख ही नहीं सकती थी। उसके लिए जब पिता ने वर की तलाश शुरू की तो कुछ ही समय बाद हार गए। सुधा को कोई लड़का पसंद ही नहीं आता। उसके पिता अपनी हैसियत के अनुसार देख रहे थे और सुधा के मन में, अपने भावी पति की कल्पना एक युवा, अति सुंदर और बहुत धनवान की थी। उसके पिता वय और सुंदरता में उनकी बराबरी करने वाला ही ढूंढ़ रहे थे। पर उनमें कोई ऐसा धनवान नहीं था, जो सुधा के मानकों पर खरा उतरता।

राधा ने उसको टटोला भी, ‘दीदी, पिताजी इतने अच्छे रिश्ते बता रहे हैं, फिर भी तुम मना कर देती हो। कहीं अपनी पसंद से किसी को चुन तो नहीं लिया? तुम्हें शर्म आती हो तो मैं पिताजी को बता दूं।’

‘चल हट, बड़ी आई बताने वाली। इतने अच्छे लड़के हैं तो तू क्यों नहीं पसंद कर लेती इनमें से एक? आखिर दोनों को ही आगे पीछे या साथ-साथ विवाह तो करना ही है।’

‘मुझे अब क्या जरूरत है पसंद करने की?’ राधा उमंग से बोल उठी। 

‘क्यों भई, तुम क्या सब लड़कियों से अलग हो? तुम भी तो सब की तरह विवाह करोगी न?’

‘विवाह तो करूंगी, पर अपनी पसंद से।’

‘मैं भी वही कर रही हूं, अपनी पसंद का पति ढूंढ़ने का प्रयास कर रही हूं।’ सुधा झटके से बोली। राधा उसको थोड़ी देर एकटक देखने के बाद बोली, ‘तुम क्या चाहती हो, ये ही बता दो।’

‘तू मेरी शादी के लिए इतनी उतावली क्यों है? मेरे कारण तेरी राह में कोई रोड़ा थोड़े ही है। पहले मेरी हो या तेरी, कोई फर्क थोड़ी पड़ेगा।’ सुधा हंसते हुए बोली।

‘न तो मुझे जल्दी है, न ही मैं उतावली हो रही हूं। पर अगर इतना बता देगी कि कैसा पति चाहती है, तो पिताजी को थोड़ी आसानी हो जाएगी। वे परेशान हैं, पर तुझसे पूछने में हिचकते हैं।’

‘हूं, तो पिताजी ने आपको दूत बनाकर भेजा है। अच्छा सच-सच बताऊं, मुझे क्या चाहिए, तो सुन, आजकल चाहिए ढेर-सा पैसा। पैसा हो तो बाकी सब अपने आप हासिल होता चला जाता है। पिताजी ने जो लड़के गिनाए हैं, उनमें से एक भी इतना पैसे वाला नहीं है। मध्यम वर्ग में हमें इतना पैसा वाला मिलेगा भी नहीं। अब समझी, मैंने इन लोगों के लिए हां क्यों नहीं भरी?’

सुधा की बातों से राधा को कुछ भय-सा लगा। सुधा की बातें सही नहीं लग रही थीं, पर कहां से या कैसे गलत हैं, ये स्पष्टतया खुद भी समझ नहीं पा रही थी। सुधा की कही बातों को जब उसने पिताजी तक पहुंचाया, तो उनके माथे पर बल पड़ गए। मां यही बोली, ‘यही सोचकर तसल्ली करो कि किसी को लाकर खड़ा नहीं कर दिया कि इसी से ब्याह रचाऊंगी। कम से कम पसंद करने की जिम्मेदारी तो मां-बाप पर ही डाली।’

‘काहे की हमारी पसंद? हमको तो बस हिदायत है कि इस तरह का दामाद ढूंढ़कर लाओ। फिर मूल्य उसका चाहे जितना चुकाना पड़े।’ पिताजी की हताश आवाज राधा को बार-बार उकसा रही थी कि सुधा को जाकर कहे कि उसने जो मांग की, वो सही नहीं है। पर तर्क क्या देगी, यह भी तो समझ में नहीं आ रहा था। सुधा जिस तरह हर बात में पैसे को महत्व देती थी, उससे उन दोनों में कई बार विवाद हो चुका था। 

सुधा को अच्छा रहना और अच्छा खाना भाता था। वो शौकीन थी तो उसे सलीके से श्रंगार करना भी आता था। बस वो राधा की इस बात से सहमत नहीं थी, कि चादर देखकर पांव पसारना चाहिए। सुधा की मान्यता थी कि बढ़ती मांग के अनुसार चादर को बड़ा करने की कोशिश करनी चाहिए। राधा को आश्चर्य होता कि सुधा पिता की परेशानी नहीं समझ पा रही है। पिता अभी तक दोनों के लिए करीब-करीब समान स्तर के वर ढूंढ़ रहे थे, जिससे दोनों पुत्रियों का भविष्य सुरक्षित हो सके। चूंकि सुधा बड़ी थी, इसलिए पहले उससे पूछा जा रहा था। अब जब उसने अपने मन की बात बताई, तो उनकी फिक्र और बढ़ गई। उन्होंने राधा से कहा, ‘तुझे अगर कोई पसंद है, तो तू ही बता दे।’ राधा ने टाल दिया, ‘पिताजी, आप जरा भी फिक्र न करें। जहां दीदी अपनी पसंद बता देंगी, बस मैं भी चट बात दूंगी।’

पिताजी को लगा कि राधा ने अभी तक आए रिश्तों में से किसी को पसंद कर लिया है। अब अगर सुधा के लिए अमीरजादा तलाशते हैं, तो राधा के साथ अन्याय होगा। दोनों के लिए तो क्या, एक के लिए भी अमीरजादा लाना उनके वश की बात नहीं थी। उनकी रातों की नींद उड़ चुकी थी। न उन्हें खाने की सुध रही, न पहनने की।

राधा से पिताजी की परेशानी देखी नहीं जा रही थी। उसे लगा, यही मौका है कि वो अपनी और राहुल की बात बताए। डरते-डरते किसी तरह राधा ने जब राहुल और अपने बारे में बात की तो उसने भी इतनी भयंकर प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की थी। पिताजी को गलतफहमी हो गई कि वे अपने पुत्रियों के लिए दामाद ढूंढ़ने में असमर्थ हैं। वे हीन भावना से भर गए। इसके बाद सुधा के लिए लड़का ढूंढ़ने में इतनी जल्दी करने लगे कि हैसियत से बाहर चले गए। सुधा की शादी में इतना धन खर्च हो गया कि उनके पास, उस छोटे से मकान के अलावा कुछ न बचा।

वे अच्छी तरह जानते थे कि साधारण-सा लड़का भी राधा के लिए ढूंढ़े तो भी उनके पास देने को कुछ भी न था। पर उनका आत्मसम्मान आहत होता था। सो उन्होंने राधा-राहुल को न तो विवाह की मंजूरी दी, न ही जब वे ‘कोर्ट-मैरिज’ करके आए, तो आशीर्वाद ही दिया। राहुल को देखकर वे निराश नहीं हुए, पर फिर भी उन दोनों से संबंध तोड़ लिए। सबसे अधिक ठेस तो राधा को पहुंची। माता-पिता की सेवा में तत्पर रहने वाली वो ही थी। सुधा को तो अपने श्रंगार-पिटार से ही फुरसत नहीं मिलती थी। एक शहर में रहते हुए भी राधा, अपने माता-पिता से मिलने को तरस गई। पिताजी का गुस्सा इसी बात पर था कि राधा ने इस तरह का विवाह कर उनकी नाकाबिलियत पर मुहर लगा दी। उनकी यह गलतफहमी उनके खुद के दिमाग की उपज थी। राधा की मां ने भी लाख समझाया, पर वो अपने विचारों से, तिल भर भी सरकने को तैयार न हुए। 

उधर सुधा का मायके आना कम हो गया था। प्रौढ़ मां-बाप हमेशा सुस्त और बीमार लगते, घर वीरान और खाली लगता। उसकी बड़ी इच्छा थी कि राधा को पैसे का महत्व बताए, अपनी शानो-शौकत दिखाकर राधा को चकित करे। अपने जीवन में वह इतनी मशगूल हो गई कि अपने मां-पिता और जुड़वा बहन तक को भूल गई। मायके न आने का एक बहाना और मिल गया कि बेटा स्कूल जाने लगा है और बेटी नर्सरी।

जब पिताजी बिस्तर पर पड़ गए तो राधा और राहुल ने आकर उनको संभाला। राधा सारा काम वैसे ही करती रही, जैसे अपने विवाह के पहले करती आई थी। मां को हमेशा ही राधा से अधिक लगाव था। उसके हाथ बंटाने से उन्हें तसल्ली भी मिली और आराम भी। सुधा का अ•िामान तो अपनी चरम सीमा पर था। वो राधा को पत्र लिखना भी बंद कर चुकी थी। अब राधा को ही उसे लिखना पड़ा कि पिताजी की तबियत बहुत खराब है, और वे सुधा और उसके पति को एक नजर देखना चाहते हैं। सुधा ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया कि इस समय तो आने में असमर्थ है पर आगे जब भी जरूरत होगी, वो आ जाएगी। न जाने सुधा ने किस मन से यह लिखा था, वो जरूरत तुरंत ही आन पड़ी, जब पिताजी का देहांत हो गया।

वो आई और तेरह दिन रही जरूर, पर इस तरह मानो किसी छूत की बीमारी से बच रही हो। तेरहवीं की रात को निकलने का सोच रही थी, पर मां के कहने से रात का सफर मुल्तवी कर दिया। मां ने तो यह भी कहा था कि दो-चार दिन रुक जाए तो दोनों बहनें आराम से बैठकर बातें भी कर लें और कुछ चीजों का निपटारा भी कर लें। पर वो किसी तरह न मानी और बोल दिया कि उसके हिस्से में जो भी आता है वह रख लें, कभी बाद में ले जाएगी या फिर किसी के साथ भिजवा दें। मां क्या कहती। मां का मन खिन्न हो उठा और उन्होंने उसे और नहीं रोका।

मां को राधा पर दया और ममता अधिक हो गई। दिन-रात एक कर उसने पिताजी की सेवा की, मां की देखभाल की। ऐसे मां-बाप की सेवा की जिन्होंने उससे रिश्ते तोड़ लिए, उसे कुछ दिया ही नहीं। 

राधा की चिट्ठी पढ़ते हुए सुधा को अचानक अपने छोटेपन, अपनी मानसिकता पर लज्जा आ रही थी। राधा ने लिखा था, ‘सुधा मैं पहले ही पत्र लिख देती, पर पिछले दिनों की शारीरिक थकान और मानसिक तनाव से बीमार पड़ गई। मां चाह रही थी कि घर की चीजों में जो हम लोगों को ठीक लगे ले लें। मां की आवश्यकता के अलावा जो भी चीजें हैं, उन्हें बेचकर हम आधा-आधा ले लें। हमारे छोटे से घर में आवश्यक वस्तुएं सब हैं, उन्हें तुमको लिखा था एक बार आकर देख लो कि तुम उनमें से कुछ ले जाना तो नहीं चाहोगी। पर आना तो दूर, तुमने जवाब भी नहीं दिया। राहुल और मैं कब तक हमारे और मां के बीच दौड़ लगाएं इसलिए मां के कहे अनुसार अतिरिक्त चीजें बेच दीं। तुम्हें उस का चेक •ोज रही हूं।’

पिताजी ने अपनी आखिरी इच्छा यह बताई थी कि मां की मृत्यु के बाद घर राहुल के नाम हो जाए। उन्हें बड़ा रंज था कि वे राहुल या मुझे न विवाह में कुछ दे पाए न बाद में। ये तो उनकी बात है। पर हम दोनों को यही तसल्ली है कि उनकी मृत्यु से पहले, उनकी सेवा कर पाए और मां की मदद। वैसे घर बेच दिया है और उसी रकम को मां के नाम से बैंक में जमा कर दिया है। अब वो हमारे साथ रहेंगी। उन्हें अकेला छोड़ना, हम दोनों को किसी तरह ठीक न लगा। उम्मीद है वहां तू, जीजाजी और बच्चे प्रसन्न होंगे। पत्र बहुत लंबा हो गया है, पर चाहती थी कि हर बात का खुलासा हो जाए। हो सके तो कभी मिलने आना। मां से अब तो यहीं मिलना होगा, तुम्हारी राधा।

पुनश्च, मां तुमसे बहुत नाराज है कि पत्र तक नहीं लिखती। मां से छिपाकर ये बात लिख रही हूं। मां को दुख न हो, इसलिए शीघ्र ही उन्हें पत्र लिखना, राधा।’

राधा ने जिस तरह अधिकार से राहुल और खुद के लिए हम और हमारा घर प्रयुक्त किया है, वैसा वो न कर पाती, न उसने इस तरह बोल कर देखा। मैं, मेरे बच्चे और मेरा घर इसी तरह तो उसके मुंह से निकलता है। आज उसे श्रीमती अस्थाना के यहां किटी पार्टी में जाना है। वो तैयार होने ही जा रही थी कि ये पत्र आ गया। पत्र पढ़ने के बाद अनायास ही, पिता की मृत्यु के पहले के पत्र और मृत्यु के बाद के ये कुछ दिन, उसके स्मृतिपटल पर मंडराने लगे थे।

राधा की तरह वो संवेदनशील क्यों न हो सकी? कहने को तो दोनों जुड़वा हैं, नाम में भी बस एक अक्षर का अंतर है। उसका पति अमीर है, पर बुरा नहीं। मिलनसार और दूसरों की मदद करने में तत्पर ही देखा है उसने। गलती शायद उसी की है। वो खुद तो एक टापू पर चढ़ गई, सबसे कटी-कटी और पति को उस टापू पर रहने को विवश करने लगी। सुधा को अपने पति का निश्छल मन भी नहीं दिखा, न खुद से कुछ सोच-विचार करने का कष्ट किया। उस समय तो उसे यही लगा था कि राधा बेवकूफ है जो सब कुछ खोकर, एक अदद पति पाने की कोशिश कर रही है। अपने इस तरह के व्यवहार से उसने अपने पति की इज्जत भी घटाई है। उसने तो खून के रिश्तों को ही एक तरह से नकार दिया था। पति के साथ भी तो उसके रिश्ते केवल भौतिक आधार पर टिके हुए थे।

आज जब ये बातें, बवंडर की तरह उसके दिमाग में चक्कर काट रही हैं, तो पहले उसे क्यों कुछ न नजर आया, न सूझा। उसके ‘मैं’ के सामने उसका मन भी सो गया था या कि मर गया था। नहीं-नहीं उसकी इच्छा हुई, चीख कर कहे, ‘नहीं मन अभी मरा नहीं।’

 

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story of twins sisters man abhi bhara nahi kahani

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