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भाजपा के बढ़ते वर्चस्व से, राजनीतिक दलों को अपनी जमीन खोने की घबराहट

2014 के लोकसभा चुनावों में देश की जनता ने इनको बड़ा सबक सिखाया है।

भाजपा के बढ़ते वर्चस्व से, राजनीतिक दलों को अपनी जमीन खोने की घबराहट
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दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकजुट हुर्इं छह राजनीतिक पार्टियों-समाजवादी पार्टी, जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (एस), इंडियन नेशनल लोकदल और समाजवादी जनता पार्टी को आज सबसे ज्यादा चिंता अपनी-अपनी जमीन बचाने की जान पड़ती है। इनको सबसे ज्यादा खतरा भाजपा से है। यही वजह हैकि इन दलों के प्रमुख नेता मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव व एचडी देवेगौड़ा, नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के विरोध में सबसे ज्यादा मुखर हैं।

दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनावों में देश की जनता ने इनको बड़ा सबक सिखाया है। मतदाताओं ने इनके घिसेपिटे विचारों को रिजेक्ट कर दिया है। जिसके बाद से ही ये सारे दल बौखला गए हैं। लोकसभा में इनकी हैसियत का अंदाजा इनको मिली सीटों से ही हो जाता है। समाजवादी पार्टी जमा पांच सीटें ही बचा पाई, सिर्फ सपा प्रमुख के परिवार के लोग ही जीत पाए। जेडीयू, जेडीएस और इंनेलो को तो सिर्फ दो-दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। बिहार में राजद पहले ही हाशिए पर पहुंच गया है, उसे चार सीटें मिली हैं। बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी पर संकट मंडरा रहा है। नीतीश कुमार को अपना जनाधार बचाने के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। यही हाल कर्नाटक में एचडी देवेगौड़ा की पार्टी की है। इस घबराहट में ये मोदी सरकार पर अनाप-शनाप के आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं। केंद्र में भाजपा की अगुआई में राजग सरकार के बने हुए करीब सात माह हुए हैं। मोदी सरकार का अब तक का प्रदर्शन बेहतर रहा है। देश में निराशा का माहौल खत्म हुआ है। अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटी है। महंगाई कम हुई है।

अंतरराष्ट्रीय जगत में देश की प्रतिष्ठा बढ़ी है। पड़ोसी देशों से संबंध बेहतर हुए हैं। नौकरशाही में सक्रियता साफ देखी जा रही है। प्रशासनिक सुधार के साथ-साथ सरकार नीतिगत बदलाव की ओर अग्रसर दिखाई दे रही है। मोदी सरकार के फैसलों के सकारात्मक प्रभाव दिखाई भी देने लगे हैं, परंतु जनता परिवार के नाम पर एकजुट हुए ये सारे दल थोड़ा भी इंतजार नहीं करना चाहते हैं। जिस कांग्रेस पार्टीकी सरकार ने पिछले दस सालों में देश को बदहाल करके छोड़ दिया। कालेधन सहित देशहित से जुड़े कई मुद्दों पर एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। उसके खिलाफ ये कुछ नहीं कहते हैं। सपा सहित कई विरोधी पार्टियां तो उसके साथ सत्ता में रही हैं।

दरअसल, कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष आज मुद्दा विहीन हो गया है। यही वजह है कि कभी वे धर्मांतरण, तो कभी आरएसएस प्रमुख के बयान के ऊपर शोर मचा रहे हैं। वे हर बात पर प्रधानमंत्री से जवाब मांग रहे हैं। विपक्षी दलों ने जिद के कारण पूरे सदन के समय को बर्बाद कर दिया है। वे अहम विधेयकों को, जिससे देश की आर्थिक सुस्ती दूर होगी और सुधारों का मार्ग प्रशस्त होगा, पास नहीं होने दे रहे हैं! लोकसभा में शांतिपूर्वक कामकाज हो रहा है। यहां मोदी सरकार बहुमत में है, परंतु राज्यसभा में स्थिति उल्टी है। विपक्षी धर्मांतरण को मुद्दा बनाकर विधेयकों को पास होने देना नहीं चाहते। उनकी मंशा एक तरफ मोदी सरकार को कामकाज से रोकना है तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों में डर पैदा करना चाहते हैं। जिससे मुस्लिम मतदाता उनके पाले में लौट आएं, पर अपनी जमीन बचाने की यह राजनीति क्या देशहित में है?

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