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सतीश सिंह का लेख : निजीकरण समस्या का हल नहीं

संसद के 29 नवंबर से शुरू हुए संसद के शीतकालीन सत्र में बैंकों के निजीकरण का विधेयक पेश किया जा सकता है। इस विधेयक में बैंककारी कंपनियों के अर्जन और अंतरण अधिनियम, 1970 एवं 1980 में संशोधन किया जाएगा। इससे जहां सरकार को इन बैंकों में और अधिक पूंजी डालने की जरूरत नहीं होगी, जिससे सरकार को अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद मिलेगी। वहीं इसके कुछ नुकसान भी होंगे। निजीकरण के बाद कर्मचारियों की नौकरी जा सकती है, जिसका नकारात्मक प्रभाव सरकार की कल्याणकारी छवि पर पड़ सकता है। असुरक्षित भविष्य की वजह से कर्मचारी बेहतर कार्य नहीं कर सकेंगे, जिससे बैंकों का प्रदर्शन प्रभावित होगा।

सतीश सिंह का लेख : निजीकरण समस्या का हल नहीं
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सतीश सिंह

सतीश सिंह

नीति आयोग की सिफ़ारिश के आधार पर केंद्र सरकार दो सरकारी बैंकों सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक में अपनी 51 प्रतिशत की हिस्सेदारी जल्द ही बेचने वाली है। सरकार ने 1 फरवरी 2021 को पेश किए गए बजट में वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान दो सरकारी बैंकों और एक सरकारी बीमा कंपनी के निजीकरण का लक्ष्य रखा था। निजीकरण की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए सरकार को बैंकिंग कानूनों में बदलाव करना होगा, इसलिए केंद्र सरकार 29 नवंबर से शुरू संसद के शीतकालीन सत्र में निजीकरण से जुड़ा विधेयक पारित कर सकती है। इस सत्र में सरकार ने कुल 26 विधेयकों को संसद में पारित करने का लक्ष्य रखा है, जिसमें यह विधेयक भी शामिल है। इस विधेयक में बैंककारी कंपनियों के अर्जन और अंतरण अधिनियम, 1970 एवं 1980 में संशोधन किया जाएगा साथ ही, बैंकिंग नियमन कानून 1949 में भी संशोधन किया जाएगा। पेश किए जाने वाले बैंकिंग कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 के जरिये सरकारी बैंकों में न्यूनतम सरकारी हिस्सेदारी को 51 प्रतिशत से कम करके 26 प्रतिशत की जाएगी।

मौजूदा समय में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक के शेयरों की कीमत लगभग 44,000 करोड़ रुपये हैं। इंडियन ओवरसीज बैंक का मार्केट कैप 31,641 करोड़ रुपये है, जबकि सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का मार्केट कैप 12,359 करोड़ रुपये। इस तरह, इन बैंकों में सरकार द्वारा अपनी हिस्सेदारी बेचने से उन्हें अपनी पूंजी वापस मिल जाएगी। वैसे सरकार को अपनी हिस्सेदारी बेचने में कितना समय लगेगा, अभी कहना मुमकिन नहीं है। इस पूंजी का मूल्य हिस्सेदारी बेचने के समय बाजार की स्थिति और बैंक की अंतर्निहित ताकत पर निर्भर करेगा, जैसे, शाखाओं व ग्राहकों की संख्या एवं कारोबार व एनपीए आदि का स्तर। बैंकों को बेचने के बाद सरकार को इन बैंकों में और अधिक पूंजी डालने की जरूरत नहीं होगी, जिससे सरकार को अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, वित्त मंत्रालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग आदि सरकारी विभागों को इन संस्थानों की निगरानी और पर्यवेक्षण की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे मानव संसाधन और धन दोनों की बचत होगी। माना जा रहा है कि सरकार से इन दोनों बैंकों की हिस्सेदारी खरीदने वाले अधिग्रहणकर्ता बैंक को अधिक कुशलता से संचालित कर पाएंगे। निजीकरण के बाद दोनों सरकारी बैंकों में कार्यरत कर्मचारियों की नौकरी जा सकती है, जिसका नकारात्मक प्रभाव सरकार की कल्याणकारी छवि पर पड़ सकता है। असुरक्षित भविष्य की वजह से कर्मचारी अपने काम को शिद्दत से नहीं कर सकेंगे, जिससे इन बैंकों का प्रदर्शन प्रभावित होगा।

इन बैंकों का सेवा शुल्क भी बढ़ जाएगा। ग्रामीण इलाकों में सेवा देने से भी ये बैंक परहेज करेंगे। सरकारी योजनाओं को लागू करने से भी इन्हें गुरेज होगा। कम पारिश्रमिक वाली सेवाओं जैसे पेंशन वितरण, अटल पेंशन योजना,सुकन्या समृद्धि आदि से जुड़े कार्य भी ये बैंक नहीं करना चाहेंगे। राजस्व बढ़ाने के लिए बैंक म्यूचुअलफंड, बीमा आदि गैर-बैंकिंग सेवाएं प्रदान कर सकते हैं। निजीकरण के बाद इन बैंकों के प्रति ग्राहकों के मन-मस्तिष्क में विश्वसनीयता का स्तर भी कम हो सकता है, क्योंकि हाल ही में यस बैंक और पंजाब एवं महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक (पीएमसी) डूब चुके हैं। चूंकि, मौजूदा समय में सरकारी योजनाओं को मूर्त रूप देने में सरकारी बैंकों का अहम योगदान है। इसलिए, दो सरकारी बैंकों के निजीकरण से अन्य बचे हुए सरकारी बैंकों पर सरकारी योजनाओं को लागू करने का दबाव बढ़ जाएगा। साथ ही, बचे हुए सरकारी बैंक के कर्मचारी भी नौकरी जाने के डर से दबाव में काम करेंगे, जिससे उनका प्रदर्शन भी प्रभावित होगा। इंडियन ओवरसीज बैंक में सरकार की हिस्सेदारी 95.8 प्रतिशत है, जबकि सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 92.4 प्रतिशत। माना जा रहा है कि सरकार, सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को 51 प्रतिशत तक लाएगी और उसके बाद उसे 50 प्रतिशतसे नीचे लाएगी।

निजीकरण के लिए प्रस्तावित दोनों ही बैंकों का आकार छोटा है। सेंट्रल बैंक में 33,000 और इंडियन ओवरसीज बैंक में 26,000 कर्मचारी कार्यरत हैं। इन दोनों सरकारी बैंकों में से इंडियन ओवरसीज बैंक ने 6 सालों के बाद वित्त वर्ष 2021 में 831 करोड़ रुपये का निवल लाभ अर्जित किया था, जबकि वित्त वर्ष 2020 में इसे 8,527 करोड़ रुपये का निवल नुकसान हुआ था। वहीं, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को वित्त वर्ष 2020-21 में 887.58 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। हालांकि, इन दोनों बैंकों का चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में शानदार प्रदर्शन रहा है। सेंट्रल बैंक ऑफ इडिया का चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में शुद्ध लाभ 20 प्रतिशत बढ़कर 161 करोड़ रुपये रह गया। एक साल पहले की समान तिमाही में बैंक ने 134 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया था। बैंक की कुल आमदनी इस दौरान करीब 2 प्रतिशत बढ़कर 6,833.94 करोड़ रुपये रही, जो एक साल पहले की समान तिमाही में 6,703.71 करोड़ रुपये थी। बैंक का परिचालन लाभ 42.16 प्रतिशत बढ़कर 1,458 करोड़ रुपये रहा, जो एक साल पहले 1,026 करोड़ रुपये था। बैंक का सकल ग़ैर निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) घटकर सकल अग्रिम के 17.36 प्रतिशत पर आ गया, जो एक साल पहले की समान तिमाही में 19.89 प्रतिशत था, जबकि शुद्ध एनपीए घटकर 5.60 प्रतिशत हो गया, जो एक साल पहले की समान तिमाही में 7.90 प्रतिशत था। इंडियन ओवरसीज बैंक का चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में शुद्ध मुनाफा दोगुना से अधिक होकर 376 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इस बैंक की दूसरी तिमाही में कुल आय 5,376 करोड़ रुपये रही, जो एक साल पहले इसी अवधि में 5,431 करोड़ रुपये थी। बैंक का 30 सितंबर, 2021 तक कुल अग्रिम पर शुद्ध एनपीए 2.77 प्रतिशत रहा, जो एक साल पहले 4.30 प्रतिशत था। राशि में बैंक का एनपीए 5,291 करोड़ रुपये से घटकर 3,741 करोड़ रुपये हो गया, जबकि सकल एनपीए 13.04 प्रतिशत(17,660 करोड़ रुपये) से घटकर 10.66 प्रतिशत (15,666 करोड़ रुपये) रह गया।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि मार्च 2017 में देश में 27 सरकारी बैंक थे, जिनकी संख्या विलय के बाद अप्रैल 2020 में घटकर 12 रह गई, प्रस्तावित निजीकरण के बाद सरकारी बैंकों की संख्या 10 रह जाएगी। सरकार भले ही दो सरकारी बैंकों का निजीकरण कर रही है, लेकिन निजीकरण को मर्ज की दवा नहीं माना जा सकता। हाल में सरकारी बैंकों के प्रदर्शन में सुधार आया है, जबकि निजी बैंकों के प्रदर्शन में गिरावट दर्ज की गई है। सरकारी बैंकों के विनिवेश से कुछ हजार करोड़ जरूर मिल सकते हैं, लेकिन उससे सरकार को कितना फायदा होगा का भी आकलन करने की जरूरत है। फायदा नकदी में हो, यह जरूरी नहीं है। सवाल रोजगार जाने का और बचे हुए सरकारी बैंकों पर काम का दबाव बढ़ने का भी है।

( ये लेखक के अपने विचार हैं। )


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