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पिता पुत्र के आत्मीय रिश्ते पर दो कविताएं

पिता तुम्हारी आंखों में और पिता

पिता पुत्र के आत्मीय रिश्ते पर दो कविताएं
रामदरश मिश्र की कविता : पिता तुम्हारी आंखों में
जाने क्या-क्या देखा-पाया पिता तुम्हारी आंखों में
फटेहाल बचपन था मेरा हंसती हुई उदासी-सा
भूख-प्यासा दिन आता-जाता था अपने साथी-सा
लगता था मैं हूं भर आया पिता तम्हारी आंखों में
कहां-कहां से तुम आते थे थके हुए तन में मन में
एक बेबसी चुप-चुप आकर सो जाती थी आंगन में
हिलता था रातों का साया पिता तुम्हारी आंखों में
भहराकर गिरती थीं जल में घर की दीवारें कच्ची
नंगा हो उठता था आंगन, रोते थे चूल्हा-चक्की
कैसी थी भादों की छाया पिता तुम्हारी आंखों में
सन्नाटे को तोड़ महक-सा प्यार तुम्हारा बहता था
ठंडे होठों पर गीतों का उत्सव जगता रहता था
फागुन ने था हाट लगाया पिता तुम्हारी आंखों में
चलते-चलते चू पड़ता है कोई आंसू उर में
मौसम-मौसम गाता-सा लगता है क्यों मेरे सुर में?
क्या यह सब कुछ रहा समाया पिता तुम्हारी आंखों में?
राजेंद्र उपाध्याय की कविता : पिता
1. मां बनाती थी
पिता की मनपसंद सब्जियां
जो मेरी पसंद की नहीं थीं
अब मां बनाती है
मेरी पसंद की सब्जियां
जो पिता की मनपसंद सब्जियां थीं।

2. तरह-तरह के फोटो मिलते हैं पिता के
जवान मां के साथ बगैर झुर्रियों के
और झुर्रियों वाले भी बूढ़ी मां के साथ
हरेक एलबम में हरेक फोटो में पिता जीवित हैं
वे जैसे कहीं नहीं गए हैं.....
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