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विचार: कठमुल्लों से पस्त इमरान

विवेक शुक्ला | UPDATED Sep 10 2018 9:43AM IST
विचार: कठमुल्लों से पस्त इमरान

पाकिस्तान में प्रधानमंत्री इमरान खान ने कठमुल्ला कट्टरपंथियों के दबाव में मशहूर अर्थशास्त्री और आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य आतिफ आर मियां को उनके पद से हटा दिया है। क्यों? वजह ये है कि वे अहमदिया बिरादरी से आते हैं। ये एक धार्मिक आंदोलन है, जो कि 19वीं सदी के अंत में पंजाब के गुरुदासपुर के कादियान नामक स्थान पर शुरू हुआ था। इनको 'कादियानी' भी कहा जाता है। 

दरअसल आतिफ मियां की नियुक्ति के बाद ही पाकिस्तान में कठमल्ले गदर काटने लगे थे। परिणामस्वरूप इमरान को अपने प्रिय अर्थशास्त्री को उनके पद से बाहर करने के लिए बाध्य होना पड़ा। अहमदिया आंदोलन के अनुयायी गुलाम अहमद (1835-1908) को मुहम्मद साहब के बाद एक और पैगम्बर मानते हैं जबकि अन्य मुसलमानों का विश्वास है कि पैगम्बर मोहम्मद खुदा के भेजे हुए अन्तिम पैगम्बर हैं।

इस वजह के चलते पाकिस्तान में अहमदियों को मुसलमान माना नहीं जाता। पाकिस्तान ने अपने नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुस सलाम को कभी सम्मान नहीं दिया क्योंकि वे अहमदिया थे। पाकिस्तान सरकार ने 1974 में संसद में बिल पास करवा के अहमदिया लोगों को इस्लाम से बाहर कर दिया था। अहमदियों पर  पाकिस्तान में जुल्मों-सितम होते रहते हैं।

ये अपने को मुसलमान नहीं कह सकते। वहां पर उनकी स्थिति हिन्दुओं, सिखों, शियाओं, या ईसाइयों जैसी ही है। पर विडंबना देखिए कि जहां कराची में इस्लाम के किसी फर्ज को ना निभाने वाले जिन्ना का खूबसूरत मकबरा बना है। वहीं अब्दुस्सलाम की क़ब्र पंजाब प्रांत के एक आम से क़ब्रिस्तान में है। क़ब्र के सिरहाने लगे हुए पत्थर पर पहले लिखा था पाकिस्तान के अकेले मुसलमान नोबेल पुरस्कार विजेता। बाद में मुसलमान शब्द हटवा दिया। 

इमऱान खान के सत्तासीन होने के बाद कहीं न कहीं लग रहा था कि पाकिस्तान में एक नई बयार बहेगी। वे भी नया पाकिस्तान बनाने का ख्वाब देख रहे थे। पर आतिफ मियां का प्रकरण जन्नत की हकीकत को बयां कर रहा है। मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली पाकिस्तान की पहली कैबिनेट में विदेश मंत्री जफरउल्ला खान थे। वे अहमदिया थे। तब जिन्ना ने एक हिन्दू जोगिन्द्र नाथ मंडल को भी अपनी कैबिनेट में जगह दी थी।

पर बाद के वर्षों में पाकिस्तान पूरी तरह से कठमुल्लों के कब्जे में आ गया। आतिफ मियां की नियुक्ति के बाद से ही पाकिस्तान में सोशल मीडिया आग उगलने लगा था। अहमदियों पर तमाम आरोप लग रहे थे। ये साफ संकेत है कि पाकिस्तान अब समावेशी समाज नहीं बन सकता। वहां सिर्फ सुन्नी मुसलमानों के लिए स्पेस बचा है। पाकिस्तान में पिछली सरकार के दौरान भी सत्तारूढ़ दल के सदस्य मांग कर रहे थे कि सेना में अहमदियों की भर्ती पर रोक लगे।

इस तरह की मांग करने वालों में नवाज़ शरीफ के दामाद और संसद सदस्य कैप्टन मोहम्मद सफ़दर थे। पाकिस्तान में पांच लाख अहमदिया रहते हैं। राजधानी दिल्ली में लगने वाले विश्व पुस्तक मेले में अहमदिया समाज की तरफ से किताबों का एक मंडप भी लगता है।

उनके प्रतिनिधि सबको बताते भी हैं कि सरहद पार अहमदिया समुदाय  पर कितने अत्याचार हो रहे हैं। भारत को मानवता के नाते इस मसले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठना चाहिए। भारत इस मुद्दे मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकता।

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