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निरंकार सिंह का लेख : जंग के नए हथियार

1990 के बाद से जंग के नए पहलू सामने आए। इनमें साइबर जासूसी सबसे नया है। नई तकनीक और एप्स भी उसके खास हथियार बन गए हैं। कई देश रोबोटिक सेनाएं भी तैयार कर रहे हैं। पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया पर हुआ साइबर हमला भी चीन की शातिर चाल थी। यह हमला प्रायोगिक तौर पर किया गया था ताकि चीन को अपनी क्षमताओं का पता चल सके, इसलिए सरकार को देश के व्यापक हितों को देखते हुए विदेशी तकनीक पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए।

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साइबर

निरंकार सिंह

पहले लड़ाई उन हथियारों की मदद से होती थी जो जंग के मैदान तक लाए जाते थे, लेकिन 1990 के बाद से जंग के कई नए पहलू सामने आए। इनमें साइबर जासूसी जंग का सबसे नया पहलू है। नई तकनीक और एप्स भी उसके खास हथियार बन गए हैं। कई देश रोबोटिक सेनाएं भी तैयार कर रहे हैं। पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया पर हुआ साइबर हमला भी चीन की शातिर चाल थी। यह हमला प्रायोगिक तौर पर किया गया था ताकि चीन को अपनी क्षमताओं का पता चल सके। इसलिए सरकार को देश के व्यापक हितों को देखते हुए विदेशी तकनीक पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए। खासतौर से चीन जैसे कुटिल, धूर्त और दगाबाज देश की तकनीक से तो हमें सदैव सतर्क रहना चाहिए। दुनिया के साइबर स्पेस में भी चीन का कब्जा बढ़ता जा रहा है।

चीनी सेना की सबसे सीक्रेट यूनिट 61398 साइबर जासूसी के लिए जानी जाती है। सीक्रेट यूनिट ने भारत के खिलाफ अपनी गतिविधियों को तेज कर दिया है। सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई मामले देखने को मिले हैं जिसमें देश की संवेदनशील जानकारियों को साइबर जासूसी के जरिये चीन जुटाने में लगा हुआ है। केंद्रीय सुरक्षा में तैनात एक अधिकारी के अनुसार पीएलए की यूनिट 6139 जिसका मुख्यालय चीन के शंघाई के पुडोंग जिले में है, उसकी गतिविधियों में तेजी देखी जा रही है। भारत के खिलाफ भी ये यूनिट काफी सक्रिय देखी जा रही है जिसको लेकर हमे सावधान रहने की जरूरत है। संतोष की बात है कि प्रधानमंत्री ने लालकिले से भरोसा दिलाया है कि इन खतरों का सामना करने के लिए देश फैसले ले रहा है और नई-नई व्यवस्थाएं भी लगातार विकसित कर रहा है। देश में नई राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति का मसौदा तैयार कर लिया गया है।

अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और भारत सहित दुनिया के कई देश चीनी साइबर वार से त्रस्त हैं। पश्चिमी देशों और चीन के माहिर हैकर्स के बीच साइबर वार शुरू हो चुकी है। पिछले दशकों में अमेरिका और भारत के कई सैन्य संस्थानों पर साइबर हमले हुए थे। यह हमले खुफिया सूचना जुटाने के मकसद से किए गए थे। इन हमलों के पीछे चीनी हैकर्स का हाथ था। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब चीनी हैकर्स ने पश्चिमी देशों को निशाना बनाया, लेकिन इस बार निशाने पर खुफिया सूचनाएं थीं। लिहाजा नाटो और यूरोपीय संघ ने सभी सदस्य देशों को अलर्ट जारी कर दिया। इस बार बार दी गई चेतावनी नहीं बल्कि साइबर वार की औपचारिक रूप से की गई घोषणा है। चीन भविष्य में साइबर युद्ध होने पर खुद को लाभ की स्थिति में रखना चाहता है। यही कारण है कि उसने साइबर स्पेस में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी है। चीन अपनी साइबर क्षमता को कई तरह से लैस कर रहा है। वेबसाइट्स को ब्लाक करने, साइबर कैफों में गश्त लगाने और मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर निगरानी रखने के लिए बड़ी संख्या में साइबर पुलिस तैनात कर रखी है। दुनिया चीन की साइबर मोर्चेबंदी से परेशान है।

लंदन में पिछले वर्ष साइबर सुरक्षा के लिए कैबिनेट आफिस बनाया गया था। इस आफिस का कहना है कि साइबर हमले दो प्रकार के होते हैं। एक जो कम्प्यूटर सिस्टम को खराब करते हैं और दूसरे हमले फिशिंग ट्रिप्स कहलाते हैं। अमेरिका के सुरक्षा संस्थानों सहित सभी सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों पर होने वाले साइबर हमलों में से 90 फीसदी और जर्मनी पर होने वाले साइबर हमलों मेें से 60 फीसदी चीन की तरफ से किए जाते हैं। ब्रिटेन भी बड़े पैमाने पर चीनी साइबर आक्रमण का शिकार बन रहा है। 2007 में फाइनेंशियल टाइम्स ने खबर छापी थी कि चीन ने अमेरिका के रक्षा मंत्रालय पेंटागन के कम्प्यूटर नेटवर्क को हैक कर लिया है। यह अमेरिका के सुरक्षा प्रतिष्ठान पर सफल चीनी साइबर हमला था जिसने यह बता दिया कि बहुत संवेदनशील मौकों पर चीन अमेरिका के सिस्टम को ध्वस्त करने की क्षमता रखता है। चीनी सरकार जब भी हैकिग की खबरें आती हैं तो उनका खंडन करती है। इस बारे में चीन वही नीति अपनाता है जो पाक आतंकवाद मामले में अपनाता है। मगर दुनिया इस सफाई से सतुष्ट नहीं है। उनका मानना है कि चीन स्वसत्तावादी देश है वहां इस तरह का कोई काम सरकार की रजामंदी के बगैर हो ही नहीं सकता।

साइबर दुनिया के जानकारों का कहना है कि चीन हैकरों का स्वर्ग है। रूस और पूर्वी यूरोप के देशों की तरह हैकिंग वहां का भारी मुनाफा देने वाला राष्ट्रीय खेल बन चुका है। जहां हैकर्स सम्मेलन होते हैं। इसके अलावा हैकर्स पेनीटेशन मेनुअल जैसी पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। इस इंटरनेट और कंप्यूटर संजाल से जुड़ी नई दुनिया में अगला निर्णायक युद्ध साइबर युद्ध होगा क्योंकि सारी जानकारियां कंप्यूटर नेटवर्क में ही संग्राहित है। सूचना तकनीक के मामले मंे चीन दुनिया के बाकी देशों से कहीं आगे है। हालांकि भारत आईटी शक्ति कहलाता है मगर ब्राडबैंड के इस्तेमाल और इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या में मामले में वह चीन से बहुत पीछे है। चीन की साइबर जंग भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है। 1990 के बाद से दुनिया में आर्थिक मोर्चे पर जंग शुरू हुई। यह जंग बेहतर तकनीक के माध्यम से बाजार की ताकतों को अपने नियंत्रण में लाने के लिए कौशल रूपी हथियार से लड़ी जा रही है। इस जंग में अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देश शामिल हैं। इस जंग का मकसद ज्यादा से ज्यादा दौलत दूसरे देशों से व्यापार के माध्यम से हासिल करना हैै। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम एक राष्ट्र के रूप में पीछे से लड़ी जा रही इस नए किस्म की जंग में कैसे कामयाब हों। वैश्वीकरण के इस युग में बेहतर और सस्ती तकनीक ही आर्थिक विकास की कुंजी और प्रेरक शक्ति हो गई है। चीन ने सस्ती तकनीक और अपनी मुद्रा युआन की कमजोरी के सहारे अमेरिका सहित दुनिया के बाजार पर कब्जा कर लिया है। सस्ते युआन के सहारे चीन दुनिया के अन्य व्यापारियों को बाजार से दूर खदेड़ दिया।

अमेरिकी अर्थशास्त्रियों के अनुसार दुनिया के बाजार में भरा चीनी सामान चीन की मौद्रिक धोखेबाजी का उत्पाद है। चीन को यह बात बहुत पहले ही समझ में आ गई थी कि विश्व बाजार में मुद्रा के खेल के सहारे ही अपना दबदबा कायम किया जा सकता है। इसलिए उसने कमजोर युआन के जरिए अपने निर्यात को बढ़ाकर दुनिया के बाजार को अपने माल से पाट दिया है। वास्तव में अपने आर्थिक सुधारों की शुरूआत से ही चीन ने निर्यात का मैदान जीतने के लिए अपनी मुद्रा युआन के अवमूल्यन की नीति बनाई थी। उसकी यह नीति सफल रही। सस्ती मुद्रा के कारण उसका निर्यात बढ़ने लगा। उसने दुनिया में निर्यात बढ़ाकर ही अपना विदेशी मुद्रा का भंडार बढाया है। पश्चिमी विशेषज्ञों का आरोप है कि चीन अपने यहां उपभोग को रोकता है और बचत को बढ़ावा देता है जिससे उसके बाजार में दूसरे देशों का माल नहीं पहुंच पाता है। लेकिन अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों में चीन माल भर जाता है। इस तरह से चीन ने सस्ती मुद्रा के जरिए दूसरे देशों की विकास दर को निगल लिया है। दुनिया के सबसे बड़े अमेरिकी बाजार पर चीन ने एक तरह से कब्जा कर लिया है। वह गरीब देशों को अपने कर्जजाल में फंसाकर उनका उपयोग दूसरे देशों के खिलाफ करता हैं।

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