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सरकार में जवाबदेही तय होना जरूरी, रेल हादसों से खराब हो रही है छवि

नैतिकता के आधार पर पद छोड़ने वाले प्रभु चौथे मंत्री होंगे।

सरकार में जवाबदेही तय होना जरूरी, रेल हादसों से खराब हो रही है छवि

सरकार के किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति के लिए जिम्मेदारी तय होनी ही चाहिए। पांच दिनों में दो रेल हादसे के बाद रेल मंत्री सुरेश प्रभु का अपने पद से इस्तीफे की पेशकश करना दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेना है।

प्रभु से ठीक पहले रेलवे बोर्ड के चेयरमैन एके मित्तल ने भी इस्तीफा दिया है। हालांकि उन्होंने निजी कारणों पद छोड़ने की बात कही है पर उनके त्यागपत्र को भी बार-बार रेल हादसे से जोड़कर देखा जा रहा है।

सरकार ने उन्हें दो साल का एक्सटेंशन दिया था। अब उनका कार्यकाल एक साल बचा था। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन के तौर पर लगातार मानवीय लापरवाही से हो रहे रेल हादसे को वे राेक नहीं पा रहे थे।

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सरकार में अगर ऐसी बात हो रही है कि उच्च पदों पर आसीन लोग अपनी जिम्मेदारी समझ कर पद छोड़ रहे हैं तो इसे सकारात्मक पहल मानी जा सकती है। नैतिकता के आधार पर पद छोड़ने वाले प्रभु चौथे मंत्री होंगे।

सबसे पहले रेलमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अपने कार्यकाल में रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दिया था। सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी और नैतिकता के लिए शास्त्री के इस्तीफे की आज भी मिसाल दी जाती है।

1999 में नीतीश कुमार और 2000 में ममता बनर्जी ने भी भीषण रेल हादसा होने पर नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पदों से इस्तीफे दिए थे। उस समय भी देश में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग की सरकार थी।

कांग्रेस के कार्यकाल में शास्त्री को छोड़कर और कोई नेता नहीं दिखता है, जिन्होंने नैतिकता के आधार कभी अपना पद छोड़ा हो। सुरेश प्रभु को नवंबर 2014 में रेल मंत्रालय की कमान दी गई थी। उनसे पहले सदानंद गौड़ा रेल मंत्री थे।

सदानंद ढीले नेता माने जा रहे थे, जो रेल मंत्रालय में तेजी से बदलाव नहीं ला पा रहे थे, जिसकी दरकार थी। सुरेश प्रभु को अपेक्षाकृत तेजतर्रार और प्रशासनिक लिहाज से सख्त नेता माने जाते हैं।

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वाजपेयी के काल में उन्होंने ऊर्जा मंत्री के रूप में अपनी छाप छोड़ी थी। जबकि उस समय वे शिवसेना के कोटे से मंत्री थे। नरेंद्र मोदी को प्रभु की काबिलियत पर भरोसा था, इसलिए उन्होंने भी उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया।

प्रभु को भाजपा से राज्यसभा में लाया गया। रेल विभाग जैसा अहम मंत्रालय दिया। लेकिन रेल विभाग की जो भी दिक्कत हो, रेल मंत्री के रूप प्रभु रेलवे में होने वाले हादसे पर नियंत्रण नहीं कर सके।

उनके करीब दो साल के कार्यकाल में 20 रेल हादसे हुए, उनमें नौ बड़े थे। इनमें करीब 350 रेल यात्रियों की मौत हुई और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए। रेल देश की लाइफलाइन मानी जाती है।

रेल यात्रा को सुरक्षित बनाना रेल प्रशासन का ही काम है, जिसकी कमान रेल मंत्री के हाथ में होती है। मंत्री के तौर पर प्रभु रेलवे में मामूली सुधार ही कर सके हैं, जबकि सबसे अधिक रेल यात्रा को सुरक्षित बनाने की जरूरत है।

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हमारी रेल की अधिकांश व्यवस्था पुरानी है। हम हाईटेक व हाईस्पीड रेल की कल्पना तभी कर सकते हैं, जब हमारा रेल संचालन तंत्र पूरी तरह जवाबदेह और जिम्मेदार हो। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि सरकार में जवाबदेही एक अच्छी व्यवस्था है।

प्रभु ने अपनी जवाबदेही का ही उदाहरण पेश किया है। यह सरकार के दूसरे मंत्रियों के लिए भी सबक है। पीएम मोदी 27 या 28 अगस्त को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर सकते हैं।

अब जिनको भी रेल मंत्रालय का जिम्मा मिलेगा, उनके सामने रेल हादसे पर काबू पाने की महती चुनौती होगी। अश्विनी लोहानी को रेलवे बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया है।

उन पर रेलवे प्रबंधन को चुस्त-दुरुस्त और रेल यात्रा को सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी होगी। उच्च पदों पर जब तक व्यक्ति जवाबदेह नहीं होगा, सरकार अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगी।

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