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डॉ. जयंतीलाल भंडारी का लेख : आयुर्वेद को बनाएं आर्थिक ताकत

दुनिया में कोरोना वायरस के संक्रमण की दूसरी घातक लहर ने फैल गई है। ऐसे में आयुर्वेदिक सेक्टर की अहमियत और बढ़ गई है। डब्ल्यूएचओ ने घोषणा की कि विश्व स्वास्थ्य संगठन भारत में पारंपरिक दवाओं के लिए एक वैश्विक केंद्र की स्थापना करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुताबिक आयुर्वेद भारत की विरासत है, जिसके विस्तार में पूरी मानवता की भलाई समाई हुई है। जिस तरह भारत दुनिया की फार्मेसी के रूप में उभरा है, उसी तरह पारंपरिक दवाओं का यह केंद्र भारत में वैश्विक स्वास्थ्य का केंद्र बनेगा। ऐसे में आयुर्वेदिक बाजार के तेजी से आगे बढ़ने का सुकूनभरा परिदृश्य दिखाई दे रहा है।

कोरोना वायरस से बचने के लिए अपनाएं ये आयुर्वेदिक उपाय
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आयुर्वेद (फाइल फोटो)

डॉ. जयंतीलाल भंडारी

यकीनन इस समय कोरोना संक्रमण की दूसरी घातक लहर ने देश और दुनिया में आयुर्वेदिक सेक्टर की अहमियत और बढ़ा दी है। कोविड-19 की चुनौतियों के बीच देश और दुनियाभर में आयुर्वेदिक बाजार के तेजी से आगे बढ़ने का सुकून भरा परिदृश्य दिखाई दे रहा है। पिछले वर्ष 13 नवंबर, 2020 को पांचवें आयुर्वेद दिवस के अवसर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेड्रस अधानोम घेब्रेसस ने घोषणा की कि डब्ल्यूएचओ भारत में पारंपरिक दवाओं के लिए एक वैश्विक केंद्र की स्थापना करेगा और इससे विश्व के विभिन्न देशों में परंपरागत और पूरक दवाओं के अनुसंधान, प्रशिक्षण और जागरूकता को मजबूत किया जा सकेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुताबिक आयुर्वेद भारत की विरासत है जिसके विस्तार में पूरी मानवता की भलाई समाई हुई है। जिस तरह भारत दुनिया की फार्मेसी के रूप में उभरा है, उसी तरह पारंपरिक दवाओं का यह केंद्र भारत में वैश्विक स्वास्थ्य का केंद्र बनेगा।

गौरतलब है कि जैसे-जैसे आयुर्वेद का उपयोग बढ़ता गया है, वैसे-वैसे आयुर्वेदिक दवाइयों का बाजार बढ़ता गया है। कोरोना महामारी के वैश्विक संकट के दौरान भारत के सदियों पुराने आयुर्वेद को दुनियाभर में अपनाया गया है। भारत सरकार ने कोविड-19 से लड़ने के प्रयासों में प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए आयुर्वेदिक संघटकों के उपयोग की सफल रणनीति बनाई है और दुनिया के कई देशों को आयुर्वेदिक दवाइयों और मसालों का निर्यात किया है। 21वीं सदी में भी पारंपरिक इलाज के तौर पर पहचान बनाने में कामयाब रहे आयुर्वेद ने काफी विश्वसनीयता हासिल की है और इससे आयुर्वेदिक बाजार बढ़ा है।

उल्लेखनीय है कि आयुर्वेद मार्केट से संबंधित प्रसिद्ध मेक्सीमाइस मार्केट रिसर्च के मुताबिक भारत में आयुर्वेदिक दवाइयों का बाजार आकार वर्ष 2019 में करीब 4.5 अरब डॉलर मूल्य का था, यह वर्ष 2026 तक बढ़कर 14.9 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। आरबीईएफ डॉट कॉम के मुताबिक भारत का आयुर्वेदिक बाजार तेजी से बढ़ते हुए 2022 में 9 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। निश्चित रूप से देश और दुनिया में आयुर्वेदिक बाजार बढ़ रहा है, लेकिन कई ऐसी चुनौतियां हैं, जो आयुर्वेदिक बाजार को ऐलोपैथिक बाजार जैसी ऊंचाइयों से रोकते हुए दिखाई दे रही हैं। ये चुनौतियां आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यवस्था से संबंधित हैं। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति अत्यधिक जटिल व निषेधात्मक है। आयुर्वेदिक दवाओं की प्रभावकारिता का पूर्वानुमान करना कठिन कार्य है। अत्यधिक गंभीर संक्रमण और अन्य आपात स्थितियों में आयुर्वेद की न्यून प्रभावकारिता आयुर्वेदिक दवाइयों के बाजार को सीमित कर देती है। कई बार आयुर्वेदिक दवाओं की बेहतर बाजार हिस्सेदारी के लिए कई आयुर्वेदिक दवा कंपनियां पर्याप्त वैज्ञानिक आधार के अपने उत्पादों के बारे में जिस तरह चमत्कारिक दावों को प्रचारित करती हैं, उनके प्रामाणिक नहीं होने पर आयुर्वेदिक बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। चूंकि कई बार आयुर्वेदिक दवाओं के मामले में किए गए दावों को सिद्ध करना बहुत कठिन होता है। अतएव कई आयुर्वेदिक दवाओं के बारे में यही आम धारणा बनती है कि इनके दावे अतिरंजित हैं।

उल्लेखनीय है कि कई बार अमेरिका और यूरोपीय देशों में बेची जाने वाली कुछ आयुर्वेदिक दवाओं में आर्सेनिक, मरकरी, लेड जैसी भारी धातुओं के अतिशय प्रयोग पर चिंता व्यक्त की गई और कहा गया कि भारी धातुओं का अतिशय प्रयोग स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है। ऐसे विभिन्न कारणों से दुनिया के कई देशों में आयुर्वेद को लोकप्रियता प्राप्त नहीं हो पाई है और इससे दुनिया में आयुर्वेदिक बाजार अपेक्षा के अनुरूप आगे नहीं बढ़ पाया है। निश्चित रूप से इस समय जब डब्यूएचओ ने भारत में पारंपरिक दवाओं के वैश्विक केंद्र की स्थापना सुनिश्चित की है, तब भारत के आयुर्वेदिक दवाइयों के बाजार के बढ़ने की नई संभावनाएं बढ़ी हैं। ऐसे में अब आयुर्वेदिक दवाइयों के बाजार को देश और दुनिया में तेजी से बढ़ाने के लिए कई बातों पर ध्यान देना होगा। हमें मान्य तरीकों से आयुर्वेदिक दवाइयों के दस्तावेजीकरण की डगर पर आगे बढ़ना होगा। हमारे द्वारा औषधीय पौधों को रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से पूरी तरह मुक्त रखा जाना होगा। दवाओं के निर्माण में भारी तत्वों का इस्तेमाल रोकना होगा।चूंकि भारत दुनिया में औषधीय जड़ी-बूटियों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और इसे बॉटनिकल गार्डन ऑफ द वर्ल्ड यानी विश्व का वनस्पति उद्यान कहा जाता है। ऐसे में देश में औषधीय गुणों से भरपूर सैकड़ों तरह के पौधों के अधिकतम उत्पादन की नई रणनीति बनाई जानी होगी। देश में तुलसी, अदरक, लोंग, काली मिर्च, बिल्वपत्र, नीम पत्ता, पान पत्ता, तेज पत्ता, जामुन पत्ती, सोम पत्ती, जैसी सैकड़ों जड़ी-बूटियों के उत्पादन कार्य को बढ़ाया जाना होगा। केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों के द्वारा भी किसानों को जड़ी-बूटी एवं औषधीय खेती के विस्तार के लिए और अधिक प्रोत्साहन दिए जाने होंगे।

हमें आयुर्वेदिक दवाइयों के बाजार को बढ़ाने के लिए कई और बातों पर भी ध्यान देना होगा। भारतीय औषध प्रणाली के तहत सभी औषधीय पौधों की समुचित बॉटनिकल पहचान कायम करनी होगी। औषधीय पौधों की प्रोसेसिंग वैज्ञानिक, आर्थिक और सुरक्षित तरीके से की जानी होगी। आयुर्वेदिक उत्पादों की क्षमता और सुरक्षा का निर्धारण करने के लिए फार्माकोलॉजिकल तथा क्लीनिकल अध्ययन बढ़ाया जाना होगा। आयुर्वेदिक दवाओं के लिए उपयुक्त नियमन व्यवस्था सुनिश्चित की जानी होगी। आयुर्वेदिक इलाज की प्रक्रियाओं का स्टैंडर्ड तय किया जाना होगा। आयुर्वेदिक दवाइयों की पुरानी स्टाइल की पैकेजिंग की जगह आधुनिक पैकेजिंग सुनिश्चित की जानी होगी। आयुर्वेदिक दवाइयों संबंधी शोध को बढ़ाना होगा। खासतौर से तत्काल परिणाम देने वाली और साइड इफेक्ट्स से बचाने वाली दवाइयों पर शोध पर विशेष ध्यान दिया जाना होगा।

हम उम्मीद करें कि जहां सरकार कोविड-19 के बीच दुनियाभर में आगे बढ़ते हुए आयुर्वेदिक बाजार को ऊंचाई देने के काम को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी, वहीं देश की आयुर्वेदिक दवाइयों के उत्पादक गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए समर्पित रूप से अपने काम को आगे बढ़ाएंगे। साथ ही देश के करोड़ों लोग आयुर्वेदिक दवाइयों को जीवन का मूलमंत्र बनाएंगे। नि:संदेह इससे देश का आयुर्वेदिक बाजार तेजी से आगे बढ़ेगा और आगे चलकर आईटी की तरह आयुर्वेद सेक्टर भारत के लिए विदेशी मुद्रा की चमकीली कमाई का नया जरिया बनते हुए दिखाई दे सकेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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