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मोनिका शर्मा का लेख : युवाओं को सही परिवेश मिले

गौरतलब है बीते कुछ सालों में वर्कफोर्स में महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन वहां पर माहौल आज भी उनके लिए समस्या है। जरूरी है कि सरकार और समाज दोनों, नई पीढ़ी के लिए सहज और सकारात्मक परिवेश बनाएं। देश के युवा नागरिकों की ऊर्जा को सही दिशा देने के लिए प्रयास किए जाएं। नवाचार से शोध की दुनिया तक युवा आबादी देश को नई पहचान देने की कुव्वत रखती है। जरूरी है कि देश के इन ऊर्जावान नागरिकों के लिए सहयोगी परिवेश बनाया जाए।

मोनिका शर्मा  का लेख : युवाओं को सही परिवेश मिले
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मोनिका शर्मा

भारतीय जनसंख्या आयोग के रजिस्ट्रार जनरल की ओर तैयार किए गए सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम-2018 के अनुसार भारत की आधी से ज्यादा आबादी की उम्र 25 वर्ष या इससे अधिक है। इसका अर्थ यह है कि युवाओं के मामले में भारत दुनिया का सबसे समृद्ध देश है। हमारे देश में 25 साल से कम उम्र की आबादी 46.9 फीसदी है। हमारे यहां 25 साल से कम उम्र की पुरुष आबादी 47.4 जबकि महिला आबादी 46.3 प्रतिशत है। ऐसे में कोरोना जैसे संकट का समय हो या आम दिनों में देश की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को संभालने का मौका, युवा जनसंख्या देश की ताकत बन सकती है। सही नीतियां और योजनाएं हों तो युवा पीढ़ी हर क्षेत्र में देश को आगे ले जाने का माद्दा रखती है। अफ़सोस कि हमारी युवा आबादी आज भी शिक्षा, रोजगार और सामाजिक-पारिवारिक जीवन से संबंधित फैसले लेने की सहजता पाने जैसे कई मोर्चों पर ही जूझ रही है। हालांकि भारत जैसे परंपरागत सामाजिक ढांचे और लचर व्यवस्था वाले देश में इतनी बड़ी युवा आबादी के लिए अवसर उपलब्ध करवाना और जीवन से जुड़े हर पक्ष पर सहजता लाना एक बड़ी चुनौती है, पर यह भी सच है कि इन चुनौतियों से लड़कर ही संभावनाओं के नए द्वार खोले जा सकते हैं।

दरअसल, युवा आबादी ज्यादा होने का सीधा सा अर्थ यह है कि हमारे देश में निर्भर जनसंख्या कम और कामकाजी लोग ज्यादा हैं। इतना ही नहीं आने वाले कुछ सालों तक भारत की श्रम शक्ति में युवाओं की यह बड़ी भागीदारी बनी ही रहने वाली है।

साल 2017 में आई भारत सरकार की ही यूथ इन इंडिया रिपोर्ट के अनुसार दस साल बाद यानी 2030 तक चीन में युवाओं की संख्या कुल आबादी की 22.31 प्रतिशत होगी। जापान में यह युवा आबादी 20.10 फीसदी और भारत में दूसरे देशों से कहीं ज्यादा 32.26 फीसदी होगी, जिसके चलते हमारे देश में कामकाजी आबादी अन्य देशों कि तुलना में कहीं ज्यादा होगी। ऐसे में यह देश को हर क्षेत्र में आगे ले जाने में अहम्ा भूमिका निभाने वाली जनसंख्या हो सकती है। इस आबादी के बल पर देश की अर्थव्यवस्था नई ऊंचाई पर जा सकती है। समाज में वैचारिक बदलाव लाए जा सकते हैं। कामकाज की संस्कृति में नए बदलाव सहजता के स्वीकार किए जा सकते हैं। यहां तक कि कोरोना जैसे संकट से लड़ना भी उन देशों की तुलना में आसान है, जहां बुजुर्गों की आबादी ज्यादा है।

बावजूद इसके देखने में आ रहा है कि हमारी ऊर्जावान आबादी की भागीदारी व्यवस्था से जुड़ी कई उलझनों का शिकार का है। नतीजतन जिस देश में सबसे ज्यादा युवा बसते हैं वो तकनीक, खेल, शोध और नवाचार जैसे मोर्चों पर आज भी पीछे हैं, जबकि श्रमशील आबादी के बड़े आंकड़े वाला यह दौर देश एक लिए एक सुनहरा मौका है। यह समझना जरूरी है कि यह कामगार आबादी हमेशा कार्यशील नहीं रह सकती। आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 में भी यह सामने आ चुका है कि हमारे देश की युवा आबादी हमेशा हमारी ताकत नहीं रहने वाली है। कुछ सालों बाद भारत में बुजुर्गों की संख्या भी तेजी से बढ़ेगी।

इस आर्थिक सर्वेक्षण के अध्ययन बताते हैं कि 2041 तक हमारे यहां 60 वर्ष से ज्यादा आयु वर्ग की संख्या 15.9 प्रतिशत हो जाएगी। आंकड़ों की मानें तो 2050 तक हर पांचवां भारतीय 60 वर्ष से अधिक का होगा। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की कुछ समय आई इंडिया एजिंग रिपोर्ट के अनुसार भी भारत में बढ़ती जनसंख्या व बुजुर्ग आश्रितों की अधिक संख्या दोहरी चुनौती के रूप में सामने आएगी, जिसके चलते हमारे देश के लिए सभी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। ऐसे में आज युवा श्रमशक्ति के बल पर आने वाले कल की समस्याओं से जूझने की कार्ययोजना बनाना भी जरूरी है। हमें यह याद रखना होगा कि नई पीढ़ी आज और आने वाले कल के बीच एक सेतु का काम करती है। जो हर संकट से लड़कर उज्ज्वल भविष्य की बुनियाद बनने का हौसला रखती है।

महत्वाकांक्षी और मेहनती युवा किसी भी राष्ट्र की शक्ति होते हैं। खासकर भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में तो युवा श्रम शक्ति का सबसे ज्यादा महत्व होता है। समाज के निर्माण में युवाओं की प्रभावी भूमिका रहती है। चुनौतियों से जूझने में उनका साहस, सजगता और सहयोग रेखांकित करने योग्य होते हैं। विचारणीय है कि हमारे यहां आपराधिक घटनाओं में युवाओं की भागीदारी के आंकड़े डराने वाले हैं। कार्यबल की रीढ़ कहे जाने वाले युवा अवसाद, तनाव का शिकार हैं। रोजगार के मोर्चे पर भी हमारी स्थितियां चिंतनीय बनी हुई हैं। उच्च शिक्षा और कौशल विकास के पक्ष पर भी कई समस्याएं मौजूद हैं। उच्च शिक्षित युवा भी दक्षता के मोर्चे पर कहीं पीछे नजर आते हैं।

इतना ही नहीं हालिया बरसों में हमारे देश में युवाओं की आत्महत्या का आंकड़ा भी बहुत तेज़ी से बढ़ा है। यही वजह है कि व्यवस्थागत बदलावों के प्रयासों के बावजूद देश में प्रशासनिक ढांचे से लेकर सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के कितने ही पक्षों को सुधारों की दरकार है। हालात ही ऐसे हैं कि युवाओं की ऊर्जा बेरोजगारी, असुरक्षा, असमानता और जीवनयापन की दुश्वारियों से जूझने में जाया हो रही है। गौरतलब है बीते कुछ सालों में वर्कफोर्स में महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन मानसिकता और माहौल की स्थितियां आज भी उनके लिए समस्या बनी हुई है। जरूरी है कि सरकार और समाज दोनों, नई पीढ़ी के लिए सहज और सकारात्मक परिवेश बनाएं। देश के युवा नागरिकों की ऊर्जा को सही दिशा देने के लिए प्रयास किए जाएं। नवाचार से लेकर शोध और तकनीक की दुनिया तक भारत की युवा आबादी देश को एक नई पहचान देने की कुव्वत रखती है। जरूरी है कि देश के इन ऊर्जावान नागरिकों की भागीदारी के मायने समझकर उनके लिए सहयोगी परिवेश बनाया जाए।

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