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33 फीसदी आरक्षण की मौहताज नहीं हैं देश की महिलाएं

आज जब दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है, यक्ष प्रश्न यही है कि जिस मकसद के साथ यह दिवस मनाने की शुरूआत हुई, क्या वह पूरा हुआ है?

33 फीसदी आरक्षण की मौहताज नहीं हैं देश की महिलाएं
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आज जब दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है, यक्ष प्रश्न यही है कि जिस मकसद के साथ यह दिवस मनाने की शुरूआत हुई, क्या वह पूरा हुआ है? आज आधी आबादी को परिवार, समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था में बराबरी का हक मिला है? दुनिया के कई देशों में आज भी महिलाओं को मताधिकार प्राप्त नहीं है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में कामकाजी महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले 23 फीसदी कम वेतन मिलते हैं।

समूची दुनिया में महिलाएं यौन शोषण, रेप, उत्पीड़न, भेदभाव, कुपोषण, गरीबी आदि की शिकार हैं। दिनोंदिन औरतों के खिलाफ अपराध बढ़े हैं। जिस महिला स्वतंत्रता और बराबरी के हक की मांग को लेकर महिला दिवस मनाना शुरू हुआ था, वह आज भी अधूरी है। बाजारवादी संस्कृति ने महिला स्वतंत्रता को सौंदर्य प्रतियोगिता तक सीमित कर दिया है। महिलाओं के अवसर के मामले में भारत अमेरिका, चीन से बहुत पीछे हैं।

यही वजह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी एक फीसदी से भी कम है। राजनीति में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण अब तक नहीं मिल पाया है। करीब 40 साल से बिल लटका हुआ है। निर्भया जैसे कांड अक्सर होते रहते हैं। अपने हक के लिए ही तो महिलाओं ने आवाज उठाई थी, जो एक दिवस के रूप में उत्सव बना। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक मज़दूर आंदोलन से उपजा है।

इसका बीजारोपण साल 1908 में हुआ था जब 15 हज़ार औरतों ने न्यूयॉर्क शहर में मार्च निकालकर नौकरी में कम घंटों, बेहतर वेतन व मतदान का अधिकार देने की मांग की थी। एक साल बाद 1909 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमेरिका ने 28 फरवरी को पहला महिला दिवस घोषित कर दिया। उसके बाद क्लारा ज़ेटकिन ने 1910 में कोपेनहेगन में कामकाजी औरतों की एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के दौरान अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का सुझाव दिया।

सबसे पहले साल 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया था। उस वक्त इस दिवस का लक्ष्य महिलाओं को मताधिकार दिलवाना था। 1917 में रूस की महिलाओं ने आठ मार्च (ग्रेगेरियन कैलैंडर) को महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिए हड़ताल पर जाने का फैसला किया। रूस की सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिया।

1975 में महिला दिवस को आधिकारिक मान्यता उस वक्त दी गई थी जब संयुक्त राष्ट्र ने इसे वार्षिक तौर पर एक थीम के साथ मनाना शुरू किया। इस बार थीम है ग्रामीण और शहरी महिलाएं मिलकर औरतों के जीवन में बदलाव ला रही हैं। आज भारत में महिलाएं सभी क्षेत्र-खेल, शिक्षा, विज्ञान, स्वास्थ्य, व्यापार, कला आदि में उपलब्धियां हासिल कर रही हैं और समाज में बदलाव ला रही हैं।

लेकिन कन्या भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति अपराध, यौन शोषण, लिंगानुपात में वृद्धि कुरूप सच्चाई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक ही कहा कि कहा कि हमारे देश में नारी को पूजा जाता है, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि बेटी को बचाने के लिए हाथ पैर जोड़ने पड़ रहे हैं। बेटा-बेटी एक भाव के लिए देश में एक और सामाजिक जन आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। महिलाओं के प्रति सोच बदलना व उन्हें बराबरी का हक देना ही इस दिवस को सार्थक बनाना है।

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