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''UNSC'' में मजबूत हुई भारत की दावेदारी, ओबामा ने किया समर्थन

जनवरी में भारत यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि मैं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार देखना चाहता हूं जिसमें भारत एक स्थायी सदस्य हो।

अमेरिका ने पहली बार औपचारिक तौर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी का समर्थन किया है। हालांकि अनौपचारिक रूप से अमेरिका भारत का समर्थन पहले से ही करता आ रहा है। जनवरी में भारत यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि मैं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार देखना चाहता हूं जिसमें भारत एक स्थायी सदस्य हो। गत दिनों चीन ने भी संयुक्त राष्ट्र में भारत की दावेदारी का समर्थन किया था।

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इस मुद्दे पर भारत को पहली बार उसका साथ मिला है। इसे भारतीय विदेश नीति और राजनय की उपलब्धि कही जाएगी। क्योंकि चीन शुरू से ही सुरक्षा परिषद में भारतीय दावेदारी का विरोध करता आ रहा था। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। और यह लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट की मांग कर रहा है। लिहाजा अमेरिका और चीन का खुला समर्थन निश्चित रूप से भारतीय दावेदारी को मजबूत करेगा।

सबकी सुरक्षा और सबके विकास का वादा

भारत ने तो मांग की हैकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार इसी साल होने चाहिए। गत वर्ष सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए कहा भी था कि इस वैश्विक संगठन को और अधिक लोकतांत्रिक एवं भागीदारीपूर्ण बनाने की आवश्यकता है। वैसे भी 20वीं सदी की अनिवार्यताओं को प्रतिबिंबित करने वाली संस्था 21वीं सदी के लिए प्रभावी नहीं होगी। लिहाजा सुरक्षा परिषद सहित संयुक्त राष्ट्र का सुधार करना समय की मांग है।

संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात 51 राष्ट्रों ने मिलकर की थी। इसके उद्देश्य थे अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, राष्ट्रों के बीच सद्भावना पैदा करना, मनुष्य के जीवन स्तर को बेहतर बनाना और मानव अधिकारों की रक्षा करना, लेकिन पवित्र उद्देश्य और भावना से बनी इस अंतरराष्ट्रीय संस्था पर आज कई सवालिया निशान हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संस्था अपने उद्देश्यों में पूरी तरह विफल रही है।

राजनीतिक विवादों को सुलझाने में जिस भूमिका की वैश्विक समुदाय अपेक्षा करता है, उस अपेक्षा पर यह संस्था खरी नहीं उतरी है। जन्म के समय 51 सदस्यों वाली संस्था के पास अब सदस्य संख्या बढ़कर 193 हो गई है। जाहिर है कि पांच स्थायी सदस्यों वाली सुरक्षा परिषद सारे राष्ट्रों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती और इसलिए इस परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की मांग की जा रही है। इस संस्था के बने सत्तर साल हो गए हैं। ऐसे मौके पर इसमें सुधार उपयुक्त रहेगा।

आज देखा जाए तो सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देशों यानी वीटो शक्ति वाले लगभग सभी सदस्यों-अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन ने संयुक्त राष्ट्र की सबसे शक्तिशाली शाखा में भारत को शामिल करने का समर्थन कर दिया है। उनका यह समर्थन द्विपक्षीय संबंधों की बेहतरी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत के बढ़ते महत्व का सूचक है। ऐसे में भारत के लिहाज से यह सबसे अनुकूल समय है। संयुक्तराष्ट्रसंघ का संस्थापक सदस्य होने के नाते भारत को यह सम्मान इसी साल मिलना चाहिए। क्योंकि भारत हर तरह से इसके लिए पात्र है।

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