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भारतीय राजनीति इतिहास के सबसे असभ्य दौर में

मौजूदा राजनीतिज्ञों के कारण भारतीय जनजीवन इतिहास के सबसे असभ्य दौर में है। गधा, कुत्ता, बंदर, सांप, घोड़ा, हाथी जैसे शब्दों से राजनेता एक दूसरे को उद्दंड बेशर्मी के साथ नवाजते रहते हैं।

भारतीय राजनीति इतिहास के सबसे असभ्य दौर में

मौजूदा राजनीतिज्ञों के कारण भारतीय जनजीवन इतिहास के सबसे असभ्य दौर में है। गधा, कुत्ता, बंदर, सांप, घोड़ा, हाथी जैसे शब्दों से राजनेता एक दूसरे को उद्दंड बेशर्मी के साथ नवाजते रहते हैं। देश के प्रधानमंत्री और विपक्ष के प्रमुख नेता सहित राजनीतिज्ञों के घटिया विशेषणयुक्त नाम लोगों और सोशल मीडिया ने भी रख लिए हैं। वह सब सुनने, पढ़ने, बोलने में अशोभन लगता है।

शिक्षा का वैश्विक ग्राफ दुनिया में ऊपर आ रहा है। भारतीय सियासत में असभ्यता का ड्राफ्ट उसके समानांतर ऊपर चढ़ रहा है। केवल शब्दों और भाषा में नहीं दैहिक हरकतों में भी नेता हाथ और उंगलियां संसद में भी मटका रहे हैं। आंखें ऊंची नीची करते हैं। गाल बजाते हैं बल्कि उछलकूद तक करते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो जाति, धर्म, प्रदेश और यौन तक का लिहाज किए बिना अश्लील फब्तियां कसते हैं।

बेहद मूर्ख दिखते साधु चोला ग्रहण किए लोग विधायक सांसद बन रहे हैं लेकिन कूढ़मगज औकात से अलग नहीं होते। यही हाल तथाकथित साध्वियों का है। वे दूर दूर तक साध्वियां दिखती या लगती और होती भी नहीं हैं। राजनीति के शोर बाजार में सड़ांध, फिसलन और मनहूसियत का माहौल कनात की तरह तना हुआ है। कभी वक्त था जब हिन्दुस्तान का वजीरेआजम पूरी दुनिया में सबसे बड़े बुद्धिजीवियोें की गिनती में शुमार था।

उसने इंगलिस्तानी खंदकों में बैठकर समाजवाद का भाष्य पढ़ा था। उसकी लिखी तीन किताबें और गंगा पर लिखी उसकी वसीयत इतिहास और साहित्य का प्रामाणिक परिच्छेद हैं। वह किसी भी विषय पर अधिकारिक तौर पर कहीं भी भाषण दे सकता था। वह अपने सचिवों द्वारा रटा हुआ भाषण नहीं पढ़ता था। उसकी बेटी ने भी बराबर की शिक्षा तो नहीं पाई लेकिन शांति निकेतन से लेकर इंग्लैंड होते हुए प्रधानमंत्री के पद पर बैठकर दो बजे रात तक पढ़ना उसके हुनर में था।

पिता और पुत्री के बीच आए प्रधानमंत्री आधुनिक नस्ल के बुद्धिजीवी भले ही नहीं थे। उन्हें भारत तत्व पर प्रामाणिक पकड़ थी। बाकी के प्रधानमंत्री भी आलिम फाजिल थे। चाहे पंजाब से जीतकर आएं या उत्तरप्रदेश से। एक तो बहुत बड़े सांस्कृतिक परिवार से थे जिनके भाई उतने ही ख्यातनाम रहे। दूसरे का कवि हृदय, जाति, पांति, रागद्वेष, धर्म और हर तरह के नकली पैमाने को लांघता हुआ विरोधियों तक की प्रशंसा करता रहता था।

कभी वे दिन भी थे जब संसद की कार्यवाही दर्शक दीर्घा से बैठकर देखना अपने आपमें विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में पढ़ने जैसा था। लोकसभा में कभी मधु लिमये, नाथ पई, हेम बरुआ, प्रकाशवीर शास्त्री, महावीर त्यागी, मनोहर लाल सोंधी, सोमनाथ चटर्जी, इंद्रजीत गुप्त, हीरेन मुखर्जी, कमलापति त्रिपाठी, चंद्रशेखर, जाॅर्ज फर्नांडीस, मोहन धारिया, कृष्णकांत, सी. सुब्रमण्यम, जगजीवन राम जैसे दिग्गज रहे हैं।

एक मौके पर तत्कालीन मंत्री ने मधु लिमये को टोका कि जो इबारत या अनुच्छेद उन्होंने बताया है वह सही नहीं है। लोकसभा अध्यक्ष गुरदयाल सिंह ढिल्लो ने तुरंत कहा अगर लिमये जी ने कुछ कहा है तो गलत नहीं होगा। आईन की किताब तलब की गई और सचिव की रपट के आधार पर भाषण देने वाले मंत्री को गलती माननी पड़ी। नाथ पई के भाषण देने पर उद्दंड कांग्रेसी सांसदों ने टिप्पणी की तो उन्होंने अंगरेजी में अदब के साथ स्पीकर से शिकायत की। महोदय मैं पार्लियामेट में बंदरों की हरकत बर्दाश्त नहीं कर पाता।

संसद में हंसी का माहौल छा जाता था। सोमनाथ चटर्जी थे जिन्हें उनकी पार्टी ने नहीं समझा और स्पीकर बनने के रास्ते में कम अक्ल पदाधिकारियों ने रोड़े अटकाए। राजनीति भाषा की तमीज और तमीज की भाषा का माध्यम होती है। अंगरेजी संसद में तहजीब का विश्वविद्यालय होता है। उसी मुल्क से तो भारत ने अपनी राजनीति, संसदीय प्रणाली, संविधान, अदालतें और नौकशाही का कार्य व्यापार उधार, खैरात बल्कि कई बार भीख में लिया है।

प्राचीन हिन्दुस्तान में तहजीब के इतने सिद्धांतकार मिलते हैं जिनका दुनिया में कोई सानी नहीं होगा। महाभारत के अमर रचयिता वेदव्यास ने सैकड़ों चरित्र पैदा किए हैं। द्रोणाचार्य, कृष्ण, विदुर, कर्ण जैसे कई चरित्रों के बीच बहस की ऊंचाइयां आसमान छूने लगती थीं। असाधारण और ऐतिहासिक युद्ध के किरदारों के बीच कृष्ण की रणनीतिक ऊंचाइयां सांस्कृतिक पृष्ठठभूमि का निर्माण करती थीं। उससे उनकी बौद्धिकता का ग्राफ नापा जा सकता है। विष्णुगुप्त चाणक्य बाद के इतिहास में सियासती तमीज के कोच थे। गोरखपुर में बच्चे अस्पताल में दम तोड़ रहे हैं।

मुजफ्फरपुर में एक राक्षस नाबालिग बच्चियों के बलात्कार का अपने संरक्षण में कारखाना खोल ले। बीफ के नाम पर अल्पसंख्यक मनुष्यों का कत्लेआम किया जाए। एक साधु को सरेआम सड़कों पर बेइज्जत कर उस पर लात जूतों से हमला किया जाए। कई बुद्धिजीवियों को अलग अलग प्रदेशों में गुंडे और लफंगे कत्ल कर दें। इसके बाद भी देश के शीर्ष नेता वोट बैंक की राजनीति की खातिर मौन हो जाएं।

वहां भी राजनीति भाषा की असभ्यता की स्नात्कोत्तर उपाधि देने वाला असभ्य विश्वविद्यालय है। कितने राजनेता हैं जो शीर्ष कवि केदारनाथ सिंह, कुंवरनारायण या अप्रतिम लेखक निर्मल वर्मा बल्कि राजेन्द्र यादव वगैरह से कभी मिले भी होंगे। फिराक गोरखपुरी, फैज़ अहमद फैज़, इकबाल, निराला वगैरह की कदकाठी के लेखकों का नाम उन्होंने सुना भर होगा।

ऐसे भी सांसद और विधायक हैं जो विधायिका की कार्यवाही से लेकर जनसभाओं में ऐसा कुछ कहते हैं जिससे उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। कई बार तो वे व्याकरण की टांग तोड़ते हैं। तब भाषा किसी बलात्कृता की तरह निरीह होकर उनसे अपनी रक्षा की भीख मांगती है। ऐसे भी हैं जिन्हें पहाड़ा नहीं आता। स्कूल की छोटी कक्षा में जाकर भी ब्लैकबोर्ड पर सही हिज्जे नहीं लिख पाते। वे किसी भी कौम, मसीहा या इतिहास के किसी परिच्छेद के साथ अश्लील छेड़छाड़ करते हैं।

किसी की सकूनत या पैदाइश में गंदे खून को मिलाने की जुर्रत करते हैं। फिर उसी राक्षसी भाषा में अट्टहास भी करते हैं। देश ऐसे ही लोगों के हत्थे क्यों चढ़ गया है। राजनीति में सिरफिरों का एक अलग इलाका है। साहित्य, भाषा और शब्दों ने किसी का क्या बिगाड़ा है। वे ही तो अमरता का फलसफा हैं। वे ही तो ऐसे राजनेताओं को मेंढक जैसी फितरत और उम्र भी देने का ऐलान करते हैं।

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