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अब चीन तक पाक का साथ देने को तैयार नहीं

उरी की घटना के बाद से देश में युद्धोन्माद की कोशिशें जारी हैं।

अब चीन तक पाक का साथ देने को तैयार नहीं
उरी की घटना के बाद से देश में युद्धोन्माद की कोशिशें जारी हैं। इसमें मीडिया के एक हिस्से की भी भूमिका है, जो लोगों की भावनाओं को भड़का रहा है। निसंदेह उरी, पठानकोट और गुरदासपुर की घटनाएं गंभीर हैं और इनसे पता चलता है कि पाकिस्तान की सेना, आईएसआई और उग्रवादी संगठन दोनों देशों के बीच भरोसे का वातावरण कायम नहीं होने देना चाहते।
बेशक शुरू में पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ रिश्ते सुधारने, विश्वास बहाल करने और सभी मुद्दों पर समग्र बातचीत के पक्ष में थे। उनके रुख के आगे वहां की सेना व आईएसआई तिलमिला रही थी, परन्तु जैसे ही पनामा लीक्स में नवाज शरीफ का नाम आया, वैसे ही सेना उन पर हावी हो गई। उसने ऐसा माहौल बना दिया कि नवाज ने प्रेम की पींगें जारी रखी तो उनका हर्श 1998-99 वाला हो सकता है, जब जनरल मुशर्रफ की फौज ने उनका तख्ता पलट कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। इसी भय का नतीजा है कि उफा में जारी बयान में जिस कश्मीर का जिक्र तक नहीं था, उसे लेकर न केवल पाकिस्तान ने सचिव स्तर की बातचीत को खटाई में डाला, बल्कि हर स्तर पर बयानबाजी कर कसीदगी को बढ़ाने का काम कर दिया।
संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर जिस तरह नवाज शरीफ ने आतंकी बुरहान वानी को कश्मीर का युवा नेता बताया, उससे पता चलता है कि वे सेना, आईएसआई और भारत विरोधी उग्रवादी जमातों के कितने दबाव और खौफ में जी रहे हैं। भारत की ओर से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उन्हें सही ही जवाब दिया है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केरल की जनसभा में यह कहते हुए पाकिस्तानी हुक्मरानों को आईना दिखा चुके हैं दोनों देश एक साथ आजाद हुए थे। क्या कारण है कि भारत आईटी निर्यात कर रहा है और पाकिस्तान के हुक्मरान टेरर निर्यात कर रहे हैं।
नवाज शरीफ एक ऐसी सेना से डरे हुए हैं, जिसने कभी कोई युद्ध नहीं जीता। यह ऐसी सेना है, जिसने 1971 में पूर्वी पाकिस्तान खो दिया। जो बलूचिस्तान में अपनी ज्यादतियों के चलते दुनियाभर में बदनाम हो रही है। जिसके रहते ओसामा बिन लादेन दस साल तक पाकिस्तान के एक कैंट एरिया में छिपा रहा और जिसे अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर मार डाला और पाक सेना मूकदर्शक बनी रही। इसी सेना के चलते पाकिस्तान की दुनिया में विश्वसनीयता शून्य हो गई है। कश्मीर के ख्वाब देखने वाली पाक सेना और वहां के हुक्मरान इतिहास में दर्ज घटनाओं को भूलने के आदी लग रहे हैं।
इनके एक प्रधानमंत्री ने कहा था कि हम भारत के साथ एक हजार साल तक लड़ने को तैयार हैं। हाल ही उरी की घटना के बाद सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने कहा कि हमारी सेनाएं हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है। वहां के मीडिया में ऐसा वातावरण बनाया गया, मानो युद्ध की दशा में चीन पाकिस्तान का साथ देने को तैयार है। चीन को एक सप्ताह के भीतर दूसरी बार इस तरह की खबरों का खंडन करते हुए साफ कर दिया कि भारत भी उसका दोस्त है। राहिल शरीफ नवंबर तक सेना प्रमुख हैं और अपनी सेवा का विस्तार कराने के लिए ही कश्मीर पर दांव खेल रहे हैं।
नवाज शरीफ के डरपोकपन का ही नतीजा है कि संयुक्त राष्ट्र में उन्हें जो भाषण पढ़ना पड़ा, उसकी वजह से दुनियाभर में उनकी किरकिरी हो रही है। पाक सेना प्रमुख हों, उग्रवादी जमातें या वहां के हुक्मरान, सबको पता है कि जम्मू-कश्मीर जिसका है, उसी के पास रहना है। इसके बावजूद अगर वे इसका राग अलाप कर भारत सहित समूचे दक्षिण एशिया में युद्धोन्माद भड़काने की चेष्टा कर रहे हैं तो उनके असल मंसूबों को समझने की जरूरत है। भारत की सदाशयता का गलत फायदा उठाने के कोशिश करने वाले इस कुटिल पड़ोसी देश को अगले कुछ महीनों में भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, जिसकी भारत अब हर स्तर पर तैयारी करने में जुट गया है और यह चोट किसी भी युद्ध से ज्यादा घातक होगी।

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