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ब्रिक्स से नए समीकरण की उम्मीद

क्वाड शिखर वार्ता के बाद अब ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी में भारत को रूस और चीन के साथ तालमेल सुधारने का अवसर मिलने जा रहा है। भारत के लिए यह दोनों सम्मेलन विदेश नीति में पारंपरिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होंगे। ख़ासकर, हाल ही में तनाव की शिकार भारत-चीन संबंधों में इसका अच्छा योगदान हो सकता है, ताकि भारत अपनी कूटनीति से अपने राष्ट्र हितों को साध सके और शायद चीन भी भारत को अमेरिका की पाले में पूरा धकेलना नहीं चाहेगा।

ब्रिक्स से नए समीकरण की उम्मीद
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प्रोफेसर डॉ. स्वर्ण सिंह, जेएनयू

प्रोफेसर डॉ. स्वर्ण सिंह, जेएनयू

आज विश्व में भारत के लिए अमेरिका, रूस और चीन, तीनों से तालमेल बनाए रखने के लिए इनके त्रिकोणीय समीकरण को समझना होगा और उसे अपनी विदेश नीति में सर्वाच्च प्राथमिकता देनी होगी। चार देशों के क्वाड सुरक्षा सम्मेलन में इस समूह का हिस्सा न होते हुए भी, चीन का हिंद प्रशांत क्षेत्र में प्रभाव हमेशा चर्चा का विषय बना रहता है। गत शुक्रवार को हए पहले क्वाड शिखर सम्मेलन में भी चीन की चुनौती छायी नज़र आई। हालांकि क्वाड के चारों देशों को चीन की निरंकुश उत्थान को लेकर चिंता बनी रहती है, लेकिन न रूस और न ही अमेरिका सीधा चीन से भिड़ना चाहते हैं। भारत की भी यही नीति होनी चाहिए कि उसका सब देशों से तालमेल बना रहे और उसे किसी एक शक्ति पर निर्भर न होना पड़े। ऐसा होने पर भारत को फ़ायदा कम और नुक़सान ज़्यादा हो सकता है।

इसीलिए, क्वाड शिखर वार्ता के बाद अब ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी में भारत को रूस और चीन के साथ तालमेल सुधारने का अवसर मिलने जा रहा है। भारत के लिए यह दोनों सम्मेलन विदेश नीति में पारंपरिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होंगे। ख़ासकर, हाल ही में तनाव की शिकार भारत-चीन संबंधों में इसका अच्छा योगदान हो सकता है, ताकि भारत अपनी कूटनीति से अपने राष्ट्र हितों को साध सके और शायद चीन भी भारत को अमेरिका की पाले में पूरा धकेलना नहीं चाहेगा।

जहां तक चीन का सवाल है उसको लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन भले ही कड़ा संदेश देने का प्रयास किया हो, लेकिन अमेरिका के हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सभी मित्र देश चीन से लगातार जज नज़र आते हैं, इसीलिए बाइडेन बार-बार सभी देशों को साथ लेकर चीन की चुनौती को सुलझाना चाहते हैं और क्वाड शिखर वार्ता में भी उन्होंने अपने सहयोगियों और साझेदारों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्धता को दोहराया, इसलिए यह साफ है कि भारत के लिए अमेरिका कभी चीन से नहीं भिड़ेगा। इतिहास भी यही बताता है। भारत का नेतृत्व इन जटिल सामरिक समीकरणों को खूब अच्छे से समझता है, इसीलिए पिछले साल भारत और चीन के बीच बढ़े तनाव के कारण भारत ने जो कई कठोर फैसलों के साथ चीन से आयात पर प्रतिबंध लगाए थे और अमेरिका से सैन्य सहयोग भी बढ़ाया उनमें परिवर्तन होता नज़र आता है।

पिछले साल यह भारत और चीन के रक्षा व विदेश मंत्रियों की वार्ता-जो रूस में हुईं थी से आगे चलकर सीमा के तनाव में स्थिरता आने से चीन की राष्ट्रपति शी चिनफिंग के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत आने की उम्मीद है। सीमा को लेकर पिछले कुछ सालों में तनाव की बावजूद चीन लगातार भारत आयात का सबसे बड़ा स्रोत बना रहा है। इन्हीं सालों में जब भारत को फ़र्मएसी ओफ द वर्ल्ड का ख़िताब मिला है तो भारत में बन्ाने वाली दवाइयों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का चीन से आयात लगातार बढ़ा है। आज चीन विश्व का सबसे बड़ा व्यापारी देश है, लेकिन भारत की विदेश और रक्षा नीति स्पष्ट रही है और इसे चीन के साथ पिछली सभी शिखर वार्ताओं में भारत रेखांकित करता रहा है। यानी बेहतर संबंध कायम करने और भारत-चीन संबंधों की पूरी संभावनाओं को मूर्त रूप देने के लिए सीमा पर शांति बनाए रखना एक पूर्वापेक्षा है, जिसमें चीन की ओर से विश्वास की कमी विवादों का प्रमुख कारण रहा है।

उधर चीन की तरह रूस भी भले ही क्वाड का हिस्सा न हो पर उसकी इस क्षेत्र के बड़ी शक्तियों-जैसे भारत, इंडोनेशिया, वियतनाम के साथ गहरी हिस्सेदारी रही है। तो रूस की चीन से बढ़ती दोस्ती के बावजूद उसको भी एशिया प्रशांत में बने रहने के लिए भारत की नजदीकी की ज़रूरत है। रूस ज़ाहिर है कि चीन के छोटे भाई की भूमिका में रहने के पक्ष में कतई नहीं है। रूस एक हद तक चीन से दोस्ती जरूर बढ़ा रहा है, लेकिन भारत भी उसके लिए उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है। युद्ध जैसी स्थिति में रूस भी भारत के लिए चीन से भिड़ने वाला नहीं है। रूस हमेशा भारत और चीन के साथ बेहतर रिश्तों को दोहराता रहा है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वह मौजूदा समय में अपनी शक्ति को बनाए रखने के लिए संयम और कूटनीतिक तरीके से संतुलन को कायम रखे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2018 में ही हिंद प्रशांत क्षेत्र को लेकर सिंगापुर में अपने भाषण में भारत के दृष्टिकोण स्पष्ट किया था, उसमें रूस के अलावा चीन हिंद प्रशांत के साथ जोड़ने की प्रतिबद्धता शामिल थी इसका महत्व आज भी बरकरार है।

भारत के लिए सबसे बेहतर स्थिति यही होगी, कि वह इस अमेरिका-चीन-रूस के त्रिकोणीय सामरिक समीकरण में अपनी भूमिका को लगातार मजबूत कारक रहे। एक भारत ही है सो इन तीनों में स्थिरता बनाए रखने हेतु एक सेतु की भूमिका निभा सकता और यही भारत की संस्कृति भी है। आज ऐसा कर देखने में भारत की 'वैक्सीन मैत्री' उसकी सबसे बड़ी ताक़त होगी। पहले ही भारत विश्व की 60 प्रतिशत वैक्सीन बना रहा है और अब रूस के स्पूतनिक वैक्सीन का उत्पाद भी भारत करने जा रहा है। भारत को इस त्रिकोणिय सामरिक समीकरण में अपनी भूमिका बड़ी ही सावधानी से उसे गढ़नी होगी। क्वाड सम्मेलन हो या प्रस्तावित ब्रिक्स सम्मेलन इन सभी शिखर वार्ताओं में भारत को दुश्मनी के बजाय संतुलन बनाए रखने की जरूरत है और इसमें क्वाड शिखर वार्ता के बाद अब आने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में चीन से भी आपसी संतुलन को सुधार जा सकता हैं।

क्या है ब्रिक्स : यह ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका का ग्रुप है। इसकी स्थापना 2006 में रूस, चीन व भारत के नेताओं के बीच आपसी बातचीत के बाद हुई थी। ब्रिक्स लगातार सक्रिय है और सदस्य देशों के बीच ट्रेड पर सहयोग होता है। हर साल ब्रिक्स देशों का सालाना सम्मेलन होता है जिसमें इनके शीर्ष नेता शामिल होते हैं। ब्रिक्स अब एक ताकतवर संगठन बन चुका है। सदस्य देशों की वित्तीय जरूरत पूरा करने के लिए ब्रिक्स बैंक भी बन चुका है। इसकी पांच अर्थव्यवस्थाओं की दुनिया की कुल जनसंख्या में 42 फीसदी, वैश्विक जीडीपी का 23 फीसदी और वैश्विक व्यापार का करीब 17 फीसदी हिस्सेदारी है।

- (ओपी पाल से बातचीत पर आधारित)

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