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फिर तेज हुई तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट

यह मोर्चा इतनी बार बना और टूटा है कि इसे अब बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता है।

फिर तेज हुई तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट
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नई दिल्ली. देश में जब जब आम चुनाव नजदीक आते हैं, तब तब तीसरे मोर्चे की कवायद तेज हो जाती है। यह मोर्चा इतनी बार बना और टूटा है कि इसे अब बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता है। यही वजह है कि इन दिनों गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेसी एक वैकल्पिक मोर्चे के गठन को लेकर तेज हुई सुगबुगाहट को हल्के में लिया जा रहा है।
भाकपा, माकपा और एआईएडीएमके ने अगला आम चुनाव साथ मिलकर लड़ने का फैसला किया है। गत दिनों बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी पार्टी जेडीयू, मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और एचडी देवगौड़ा की जेडी(एस) अगला आम चुनाव साथ लड़ेंगी और साथ ही चुनाव से पूर्व इस संभावित मोर्चे के गठन के लिए वामपंथी दलों सहित एआईएडीएमके, बीजद व जेवीएम आदि कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों को भी इसमें शामिल करने की कोशिश हो रही है। जिसके लिए बुधवार को राजधानी दिल्ली में बैठक भी होनी है।
भारतीय राजनीति में पिछले करीब तीन दशक से दोनों बड़ी पार्टियों से इतर तीसरा मोर्चा चर्चा में है, लेकिन तमाम कवायदों के बाद भी अभी तक यह शक्ल नहीं ले पाया है। वैकल्पिक मोर्चा अगर वाकई बन रहा है, तो उसे सबसे पहले अपनी विश्वसनीयता कायम करनी होगी। अतीत के राष्ट्रीय मोर्चा और संयुक्त मोर्चा की तरह कुछ दिनों में इस वैकल्पिक मोर्चे का हश्र भी सामने आ जाएगा, लेकिन जिस तरह से कई प्रांतों की राजनीतिक पार्टियां एक बार फिर इस मोर्चे के प्रति सुर में सुर मिला रही हैं, उससे इस मुहिम में नई जान पड़ती दिख रही है। इन सबसे प्रमुख सवाल यह है कि ऐसे किसी मोर्चे की देश में उपयोगिता, प्रासंगिकता अथवा जरूरत ही क्या है? अतीत में देश में तीसरे मोर्चे के अब तक जितने भी प्रयोग हुए हैं उनका हर्श सामने है। एक भी सफल और स्थाई सरकार देने में कामयाब नहीं रहे हैं।
1989 में बनी विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार नौ महीने में ही गिर गई थी। उसके बाद चंद्रशेखर सिंह की अगुआई में बनी सरकार का भी वही हाल हुआ। वर्ष 1996 में एचडी देवेगौड़ा और इसके बाद 1997 में इंद्र कुमार गुजराल की सरकारें भी एक वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं। दरअसल, कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर बनाई गई इमारत ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाती है। इन सरकारों का भी वही हाल हुआ है।
क्षेत्रीय दलों के अपने हित और विचारधाराएं होती हैं। निजी महत्वाकांक्षा इनको एक साथ खड़ा करती रही है। शायद यही वजह है कि यह मोर्चा कभी टिकाऊ व विश्वसनीय नहीं बन सका। सरकार बनाने और सत्ता सुख के प्रलोभन में आकर शुरुआत में तो ये पार्टियां एकजुटता दिखाती हैं, लेकिन धीरे-धीरे इनके बीच विचारों और हितों की टकराहट विकराल रूप धारण कर लेती है। इनके निजी हित इतने बड़े हो जाते हैं कि देश हित लगभग गौण हो जाता है। वे अपने राज्यों के स्थानीय मुद्दों, अपनी पार्टी और अपने नेताओं के हित साधने में मशगूल हो जाते हैं। पिछले अनुभवों के आधार पर कहना गलत नहीं होगा कि गठबंधन की स्थिति में दोनों प्रमुख पार्टियों भाजपा या कांग्रेस के नेतृत्व में ही देश को स्थाई सरकार मिल सकती है। कुल मिलाकर यह अवसरवादियों का जमावड़ा है जो मौका देखकर इकट्ठा होते हैं।
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