Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

महिलाओं को उम्मीदवार बनाने में हिचक क्यों

संसद व विभिन्न विधानसभाओं में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने के मामले में हालात अब भी चिंताजनक हैं।

महिलाओं को उम्मीदवार बनाने में हिचक क्यों
भारतीय लोकतंत्र ने बीते छह दशक में एक लंबा सफर तय किया है और इस यात्रा में बेशक इसने कई उपलब्धियां भी हासिल की है, लेकिन अभी भी कई ऐसे क्षेत्र हैं, जो उपेक्षित हैं और विकास की बाट जोह रहे हैं। ऐसा ही एक मुद्दा राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की है। संसद व विभिन्न विधानसभाओं में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने के मामले में हालात अब भी चिंताजनक हैं। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान आम चुनावों में पांच चरणों के लिए 232 सीटों पर हुए नामांकन में महिला प्रत्याशियों की उपस्थिति मात्र सात फीसदी है। इन सीटों पर कुल 3064 पुरुष प्रत्याशियों की तुलना में सिर्फ 241 महिलाएं ही चुनाव मैदान में अपनी किस्मत आजमा रही हैं।
यह दृश्य तब देखने को मिल रहा है जब देश में इस समय महिला मतदाताओं की भागीदारी करीब 49 फीसदी है। यह नहीं अपने मताधिकार का प्रयोग करने के मामले में भी वे पुरुषों से बहुत ज्यादा पीछे नहीं हैं। मौजूदा 15वीं लोकसभा में महिला सांसद मात्र 10.9 फीसदी हैं और तो और इनमें भी ज्यादातर को राजनीति विरासत में मिली है। यदि वैश्विक आधार पर देखें तो महिलाओं की संसद में उपस्थिति बताने वाली इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन (आईपीयू) की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 188 लोकतांत्रिक देशों की सूची में भारत 108वें स्थान पर है।
इस मामले में नेपाल, पाकिस्तान और चीन जैसे हमारे पड़ोसी देश भी हमसे बहुत आगे खड़े हैं। जब जीवन के हर क्षेत्र में आधी आबादी की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है, राजनीति में शीर्ष स्तर पर कम उपस्थिति कईसवाल पैदा करती है? इससे यह भी सवाल खड़ा होता हैकि प्रमुख राजनीतिक दलों को आधी आबादी पर भरोसा क्यों नहीं है। वे उन्हें टिकट देने में हिचक क्यों रहे हैं। हम 21वीं सदी में हैं, परंतु समाज में अभी भी कई स्तरों पर पुरुषवादी मानसिकता हावी है। राजनीति में भी इसका प्रभाव बना हुआ है। इस स्थिति को बदलने के लिए राजनीतिक दलों को अपनी नीयत बदलनी होगी।
अभी महिलाएं कार्यकर्ता और मतदाता तो हैं पर उनके पास नेतृत्व नहीं है और जब तक उनके पास नेतृत्व नहीं होगा, महिला सशक्तिकरण की बात बेमानी होगी। महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की यह स्थिति भारतीय समाज में मौजूद लैंगिक भेदभाव का सूचक है। सच तो यह है कि महिलाओं को अवसर ही नहीं दिया जाता है, परंतु उन्हें जब-जब अवसर मिला, खुद को साबित किया है। हमारी पंचायतें और नगरपालिकाएं इसका उदाहरण हैं। इसमें महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के बेहतर परिणाम हमारे सामने हैं। यहां महिलाओं ने अपने नेतृत्व का लोहा मनवाया है। आज ज्यादा ये ज्यादा महिलाओं को चुनाव में उम्मीदवार बनाने की जरूरत है। वहीं संसद व विधानसभाओं में उनके लिए आरक्षण पर भी निर्णायक बहस की जरूरत है।
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि और हमें फॉलो करें ट्विटर पर-
Next Story
Top